खरी सेवा


सा रसना ते नयने तामेव करौ स एव कृतकृत्यः । या ये यौ यो भर्गं वदतीक्षेते सदार्चतः स्मरति ॥ – शिवानन्दलहरी                
अर्थ : वह जीभ नहीं यदि वह सतत हरि सुमिरन न करे | वह नेत्र नहीं जो सभीमें ईश्वरके स्वरूपका दर्शन न कर पाए | वह हस्त नहीं जो ईश्वरके शरणागत होकर जुडे नहीं | यदि कर्म करते हुए अखंड ईश्वरका स्मरण हो तभी समझें कुछ सेवा हुई |


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution