हमारी वैदिक संस्कृति पुनर्जन्मके सिद्धान्त को मानती है । अनेक व्यक्ति मुझसे कहते हैं इस जन्ममें हमने किसीका कुछ नहीं बिगाडा है , तब भी मुझे इतना क्यों कष्ट हो रहा है, हमारे जीवनमें अधिकांश कष्ट ( लगभग ६५ % कष्ट ) प्रारब्धवश अर्थात पिछले जन्मोंके कर्मके कारण आते हैं , ऐसे प्रारब्धके नाश हेतु तीव्र साधना करनी चाहिए , कष्ट क्यों और किस प्रकार आता है , इस सम्बन्धमें प्रस्तुत है मनुस्मृतिसे एक श्लोक !
बंधु प्रियवियोगांश्च संवासं चैव दुर्जनै : । द्रव्यार्जनं च नाशं च मित्रामित्रस्य चार्जनम् ।।
जरां चैवाप्रतिकारां व्याधिभिश्चोपीडनम् । क्लेशान्श्च विविधांस्तांस्तान्मृत्युमेव च दुर्जयम् ।। – मनुस्मृति
अर्थ : पाप कर्म करनेवालेको जीवनमें अपने प्रियजनोंका विरह, बुरी संगति, धनार्जनमें बाधाएं, अर्जित धनका समाप्त होना, मित्रोंकी हानि एवं शत्रुओंकी संख्या अधिक होना आदि कष्टोंको भोगना पडता है ।अपरिहार्य वृद्धावस्था और गंभीर रोगोंके कष्टसे दुष्ट लोगोंको अधिक व्यतीत करना पडता है । इस प्रकार उनका सम्पूर्ण जीवन दुख और कष्ट झेलते ही व्यतीत होता है एवं अंतत: वे मृत्युके ग्रास बन जाते हैं।
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