नारीपर अत्याचार करने वाले नरको वैदिक सनातन धर्ममें पुरुष नहीं ‘असुर’ कहते हैं


अबला नारीपर अत्याचार करनेवाले नरको वैदिक सनातन धर्ममें पुरुष नहीं, ‘असुर’ कहते हैं; क्योंकि पुरुष तो कभी नारी, वृद्ध और बालकपर अत्याचार कर ही नहीं सकता; अपितु जहां पुरुष रहते हैं, वहां यह सब रात्रिमें भी निश्चिन्त होकर एकाकी घूमते हैं, ऐसा शास्त्रवचन है । यदि पुरुषके रहते हुए ये सारे क्लेशमें रहें, स्त्रियां असुरक्षित रहें और उनपर अत्याचार हो एवं पुरुष मुखर होकर उनका विरोध न करें तथा ऐसे अत्याचारियोंके नाश हेतु प्रयत्न न करें, तो ऐसे पुरुष मात्र सन्तान उत्पन्न करनेवाले नर-पशु होते हैं ! वीर पुरुषोंकी इस पुण्यभूमि भारतमें ऐसे नर-पशुओंकी संख्यामें भारी वृद्धि हुई है और पृथ्वी माताका भार बढ गया है । इतिहास साक्षी है, ऐसी परिस्थितिके आनेपर ईश्वरने अनेक बार मारकरूप धारणकर, दुर्जनोंका संहारकर, खरे पुरुषकी अवधारणाको पुनर्स्थापित किया है ।



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