क्या आपने कभी सोचा है कि आजके वैज्ञानिक युगमें भी इतनी प्रलयंकारी प्राकृतिक आपदाएं क्यों आती रहती हैं और विनाश लीला खेल कर कर उनकी सारी वैज्ञानिक उपलब्धियोंकी ‘पुंगी’ बजाकर (उपहास कर) क्यों चली जाती हैं ?
धर्माधिष्ठित राष्ट्र ही सुखी, समृद्ध और प्राकृतिक प्रकोपसे वंचित रह सकता है । किसी भी निधर्मी और अहिन्दू पद्धतिकी राजकीय व्यवस्थामें प्राकृतिक आपदाओंको रोकनेकी क्षमता नहीं होती; इसलिए वेदोंमें देवोंको यज्ञमें आहुति देकर उसे प्रसन्न रखनेकी प्रक्रिया बताई गई है । जैसे लौकिक ‘सरकार’के मन्त्री होते हैं, वैसे ही इस सृष्टिके कर्ता-धर्ताने विभिन्न देवताओंको सृष्टिके संचालन हेतु भिन्न-भिन्न विभाग दिए हैं, अब हम बिना विभागाध्यक्षकी अनुमति लिए, उनके विभागसे, मानवीय अविष्कारके रूपमें, अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु छेड-छाड करेंगे तो हमें दण्ड तो मिलेगा ही । जैसा कि एक अहिन्दू राजकीय व्यवस्था, वर्तमान समयमें उनको आहुति नहीं देती है तो ऐसी स्थितिमें वे अपने अस्तित्वकी शक्तिका आभास तो हमें करवाएंगे ही; अतः सनातन धर्म आधारित राष्ट्रप्रणाली ही एक मात्र ऐसी प्रणाली है, जिसमें ‘बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय’का सिद्धान्त अन्तर्भूत तो है ही सृष्टिके संचालनके सभी अवयवोंके प्रति कृतज्ञताका भाव भी समाहित है और इसलिए यह पद्धति ही सर्वश्रेष्ठ और मानवके लिए हितकारी है । – तनुजा ठाकुर
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