धर्मार्थो य : परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशान्गनुग: ।
श्री प्राण धन दारेभ्य: क्षिप्रः स परिहीयते।।
– विदुर नीति
अर्थ : जो मनुष्य धर्म और धर्म अनुकूल अर्थको छोडकर – उनका ध्यान न रखकर – इंद्रियोंकी इच्छाका अनुगामी हो जाता है, वह शीघ्र ही यश, धन, स्त्री आदि बांधव एवं जीवनसे सर्वथा रहित हो जाता है !
भावार्थ : धर्म और नीतिके आधारपर अर्थोपार्जनकी नीति हमारे राज्यकर्ताओंने भारतीयोंको सिखाया ही नहीं फलस्वरूप आजके सारे तथाकथित आदर्श , नेता , अभिनेता , क्रिकेट खिलाडी सभीको अधर्मके मार्गसे अर्थोपार्जन करते देख सामान्य प्रजा अपने विवेकको ताकपर रह उसी मार्गपर अर्थात विनाशके मार्गका अनुसरण कर रही है। अतः शीघ्र स्थापित होनेवाले हिन्दू राष्ट्रमें धर्म और नीतिको प्रयोगिक ज्ञान-विज्ञानके साथ अविभाज्य रूपसे पढाया जाएगा ! – तनुजा ठाकुर
Leave a Reply