हमारी भारतीय संस्कृति सदा ही वर्ण व्यवस्था आधारित थी, परन्तु धर्मकी ग्लानि होनेपर जाति व्यवस्थाके विकृत स्वरूपने वैदिक सनातन धर्मको खोखला कर दिया । हमारी संस्कृतिमें गुण, कर्म और त्यागको प्रधानता दी जाती थी और उसी अनुसार पद भी दिये जाते थे । आज भी किसी पूर्ण सन्तके आश्रममें जाकर वर्ण व्यवस्थाकी पूर्ण झलक किसी भी साधकको मिल सकती है ! खरे अर्थोंमें, वर्ण व्यवस्था आधारित समाजमें रामराज्य स्वतः ही स्थापित हो जाता है । सन्तोंका आश्रम रामराज्यकी एक छोटी इकाई होती है । -तनुजा ठाकुर
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