
चूक बताने से और उसे स्वीकार करने से हमारे चूकसे निर्माण हुए पाप कर्मके कर्म फलकी तीव्रता न्यून हो जाती है और यदि कोई संत सबके समक्ष किसी साधकके चूकको बताते है तो उस चूकसे निर्मित पाप कर्म पूर्णत: नष्ट हो जाता है ! संत द्वारा बताए गए चूकसे साधकका अहं भी नष्ट होता है । जब चूकके संबंधमें अपने श्रीगुरुसे ये दृष्टिकोण सीखे तो हमें उनसे प्रार्थना आरंभ की कि वे भी हमारे चूक सबके समक्ष बताएं और उसके पश्चात् उनकी कृपा इतनी बरसी कि वे हमारे नाम के साथ हमारे चूक, उनके मार्गदर्शन में छप रही पत्रिका में डालते थे और मैं, उन चूकोंके लिए उत्तरदाई दोषमें सुधार कर अपने व्यक्तित्त्वमें दिव्यता लानेका प्रयास आरंभ की और श्रीगुरुके इस कृपाके लिए कृत्तज्ञता व्यक्त करती रही ।वस्तुतः चूक बताना, उसके लिए उत्तरदायी दोषोंमें सुधार करना, चूकके कारण निर्माण हुए अयोग्य कर्मफलको नष्ट करने के लिए प्रायश्चित्त लेना यह साधनाका अविभाज्य अंग है ! आज देश और समाजकी यह दुर्गति इसलिए हो गयी कि क्योंकि कोई अपनी चूक स्वीकार नहीं करता और कोई चूक बताए, तो उसकी उपेक्षा की जाती है ! चूक बतानेपर उसे स्वीकार करने से हमारी अंतर्मुखता बढती है और इससे हम ईश्वरीय कृपाके पात्र बनते हैं ! जिन्हें अपने चूक स्वीकार करनेमें डर लगता है, वे सदैव अपने अहंका पोषण करते हैं ऐसे में वे साधना पथ पर कभी उत्तरोत्तर आध्यात्मिक प्रगति नहीं कर सकते और ऐसे व्यक्ति अपने अहंके कारण व्यावहारिक जगतमें भी कष्ट पाते है -तनुजा ठाकुर
Leave a Reply