ध्यानकी अधिकांश अनुभूतियां होती हैं काल्पनिक एवं क्षणिक


कुछ ध्यानमार्गी ध्यानके समय हुए अपनी अनुभूतियां मुझे बताते हैं और उतना ही नहीं उसका अर्थ पूछते हैं, वर्तमान कालमें जब सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट अपने चरम पर है ऐसेमें ध्यानके समय मात्र अपने जप, अपने इष्टके स्वरुपपर या सांसपर ध्यान केन्द्रित करें, मुझे क्या दिखाई दे रहा है उसपर नहीं, क्योंकि वर्तमान कालमें ध्यानमें सूक्ष्म जगतकी मायावी मांत्रिक (बलाढ्य आसुरी शक्तियां ) मात्र काल्पनिक या मायावी अनुभूतियां देकर साधकके अहंको बढाकर, उन्हें साधनासे दूर करनेकी व्यूह रचना करती हैं | धर्मप्रसारके मध्य पिछले बीस वर्षोंमें अभी तक जितने ध्यानमार्गीसे मिली हूँ उनमें ९९% प्रतिशत साधकोंको अनिष्ट शक्तियोंका तीव्र कष्ट हैं; अतः उनकी अनुभूतियां भी उनके कष्ट अनुरूप ही होती है, ध्यानकी अधिकांश अनुभूतियां काल्पनिक एवं क्षणिक होती हैं; अतः अनुभूतियोंमें नहीं अटकना चाहिए | आजके समयकी योग्य साधना नामजप है और वह भी अपने इष्टकी ओर देखते हुए नेत्र खोलकर करना चाहिए ! जब सम्पूर्ण विश्वमें स्थूल और सूक्ष्म स्तरपर इतना अध्यात्मिक प्रदूषण बढ गया है तो साधकका इस रज -तम वातावरणमें ध्यान कैसे लग सकता है; परंतु ध्यानमार्गियोंमें अहंका प्रमाण अधिक होनेके कारण वे सुनानेकी स्थिति में रहते हैं, सुनने और सीखनेका उनमें अधिकांशतः अभाव देखा गया है; परिणामस्वरूप जिस निराकर ईश्वरका वे ध्यान कर एकरूप होना चाहते हैं उनका संकेत वे नहीं समझ पाते हैं | नामजपके अन्तिम चरणमें अर्थात् जब नामजप परावाणीमें होने लगता है तो जागृत समाधी साध्य हो जाता है अर्थात् साधक सतत ईश्वरीय अनुसन्धानमें रहने लगता है और इस मध्य हुई अनुभूतियां काल्पनिक नहीं  होती है | नामजपमें वैखरीसे मध्यमा, मध्यमासे पश्यन्ति एवं पश्यन्तिसे परा वाणीमें प्रवास हेतु किसी सद्गुरुके शरणमें रहकर उनकी कृपा प्राप्त करनेका प्रयास करना चाहिए | -तनुजा ठाकुर (१८.५.२०१७)



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