हमारे देवस्थानों के धनका सही सदुपयोग होना चाहिए |


जितना धन हमारे देवस्थानोंमें है यदि उनका सही सदुपयोग किया जाए तो भारत के ९५ करोड हिन्दुओंको धर्मशिक्षण अत्यंत सहजतासे मिल सकता है, प्रत्येक ग्राममें एक संस्कृत विद्यालय खुल सकता है, एक गौशाला खुल सकती है, एक गुरुकुल हो सकता है | ऐसा करनेसे वैदिक संस्कृतिका पोषण होगा, हिन्दुओंमें धर्माभिमान जागृत होगा और धर्माभिमानी, जागृत हिन्दु कभी भी इस श्रेष्ठ धर्मको छोडकर किसी अन्य धर्म और पंथमें धर्मांतरित नहीं होगा ! परंतु मंदिरके कोषाध्यक्ष और कर्ता-धर्ताको ही इस बातका महत्त्व पता नहीं ! अतः इस कालको कलियुग कहते हैं ! उन्हें यह समझमें नहीं आता कि धर्मशिक्षण नहीं देनेके कारण आज इतनी धर्मग्लानि हुई है और चहुं ओर त्राहिमांकी स्थिति व्याप्त हो गयी है | जब धर्मपर आघात होगा तो धर्मस्थलपर भी होगा और जब धर्मस्थल ही नहीं रहेंगे तो हमारे देवस्थानोंके धनका सही सदुपयोग होना चाहिए !

जितना धन हमारे देवस्थानोंमें है यदि उनका सही सदुपयोग किया जाए तो भारत के ९५ करोड हिन्दुओंको धर्मशिक्षण अत्यंत सहजतासे मिल सकता धर्मस्थलका धन कहां सुरक्षित रह पाएगा !! इतिहास इस तथ्यका साक्षी है कि दुराचारी आक्रमणकारियोंने किस प्रकार हिंदुओंके धर्मस्थलको कब्रगाहमें परिवर्तित कर दिया !!-तनुजा ठाकुर

 



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