प्रेरक कथा – श्रीकृष्ण और माता द्रौपदी


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आजकल हम भोजनका अत्यधिक अपव्यय करते हैं । शासकीय अन्न भण्डारोंमें तो करोडों टन अन्न सड जाता है । जबकि आज भी हमारे अनेक कृषक दरिद्रता और भुखमरीके कारण आत्महत्या करते हैं । कई स्थानोंपर भुखमरीके कारण दरिद्र व्यक्ति अपने रक्त, यकृत (किडनी) और यहां तक अपने कोखके जन्मे बच्चे तकको अपनी भूख मिटाने हेतु बेच देते हैं । अन्नका एक कण भी व्यर्थ नहीं फेंकना चाहिए तभी अन्नपूर्णा माताकी कृपा हमपर बनी रहती है । एक कण भी विपत्तिमें हमें किसी बडे अनर्थसे बचा सकता है । इस संबंधमें एक प्रेरक कथा महाभारतसे उद्धृत कर बताती हूं ।

द्रौपदीके अक्षयपात्रके कणसे श्रीकृष्णने टाला संकट :-

दुर्योधन ईर्ष्यालु था, द्वेषी था । उसने तीन माह तक दुर्वासा ऋषिकी भली प्रकारसे सेवा की, उनके शिष्योंकी भी सेवा की । दुर्योधनकी सेवासे दुर्वासा ऋषि प्रसन्न हो गए और बोले । “मैं तुम्हारे सेवा भावसे प्रसन्न हूं जो इच्छा हो वह मांगो ।” (संतोंको हम अपनी सेवा भावसे और त्यागकी प्रवृत्तिसे प्रसन्न कर सकते हैं ।) और जो ईर्ष्या-द्वेष रूपी शत्रुके नियंत्रणमें आ जाता है, उसका विवेक उसका साथ छोड देता है; परंतु जो ईर्ष्या-द्वेषसे रहित होता है उसका विवेक सजग रहता है । वह शांत होकर विचार या निर्णय ले सकता है । दुष्ट दुर्योधनने ईर्ष्या एवं द्वेषके वशीभूत होकर कहा, “मेरे भाई पाण्डव वनमें दर-दर भटक रहे हैं । उनकी इच्छा है कि आप अपने एक सहस्र शिष्योंके साथ उनके अतिथि हो जाएं । यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मेरे भ्राताओंकी इच्छा पूरी करें; परंतु आप उसी समय उनके पास पहुंचनेकी कृपा करें, जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो ।”

दुर्योधन जानता था कि भगवान सूर्यने उन्हें अक्षयपात्र दिया है । उसमें से तब तक भोजन-सामग्री मिलती रहती है जब तक द्रौपदी भोजन न कर ले । द्रौपदी भोजन करके पात्रको धोकर रख दे तत्पश्चात् उस दिन उसमें से भोजन नहीं निकलेगा; अतः मध्याह्नके (दोपहरके) पश्चात् दुर्वासाजी उनके पास पहुंचेंगे तब भोजन न मिलनेसे कुपित हो जाएंगे और पाण्डवोंको शाप दे देंगे । इससे पाण्डव वंशका सर्वनाश हो जाएगा । इस ईर्ष्या और द्वेषसे प्रेरित होकर दुर्योधनने दुर्वासाजीकी प्रसन्नताका लाभ उठाना चाहा ।

दुर्वासा ऋषि मध्याह्नके समय जा पहुंचे पाण्डवोंके पास । युधिष्ठिर आदि पाण्डव एवं द्रौपदी दुर्वासाजीको शिष्यों समेत अतिथिके रूपमें आए हुए देखकर चिन्तित हो गए । तथापि बोले “विराजिए महर्षि ! आपके भोजनकी व्यवस्था करते हैं ।” (कहां वनमें रहनेवाले पांडवोंद्वारा ऋषिके एक सहस्र भक्तोंके भोजनकी व्यवस्था करनेको तत्पर रहनेवाले वैदिक व्यक्ति और आधुनिक विज्ञानद्वारा सारी व्यवस्था उपलब्ध होनेपर भी कहां आजके गृहस्थ, जो भोजनसे पूर्व आए कोई दो अतिथियोंको भी भोजनके लिए नहीं पूछते हैं !)

अन्तर्यामी परमात्मा सबका सहायक है,  वह सत्य और धर्मके मार्गका अनुसरण करनेवालोंकी सहायता करता है । दुर्वासाजी बोले : “ठहरो ठहरो…. भोजन थोडे काल उपरांत करेंगे । अभी तो यात्राकी थकान मिटानेके लिए हम सब स्नान करने जा रहे हैं ।”

इधर द्रौपदी चिन्तित हो उठी कि अब अक्षयपात्रसे कुछ न मिल सकेगा और इन साधुओंको भूखा कैसे भेजें ? उनमें भी दुर्वासा ऋषिको ! वह पुकार उठी, “हे केशव ! हे माधव ! हे भक्तवत्सल ! अब मैं तुम्हारी शरणमें हूं…..” शांत हृदय एवं पवित्र चित्तसे द्रौपदीने भगवान श्रीकृष्णका चिंतन किया । भगवान श्रीकृष्ण आए और बोले, “द्रौपदी कुछ खानेको तो दो !” द्रौपदी बोलीं “केशव ! मैंने तो पात्र धोकर रख दिया है ।”

श्रीकृष्ण बोले, “नहीं, नहीं… लाओ तो सही ! उसमें अवश्य कुछ होगा ।”

द्रौपदीने पात्र लाकर दिया तो दैवयोगसे उसमें तांदुलकी शाकका (सब्जीका) एक पत्ता चिपका रह गया  था । विश्वात्मा श्रीकृष्णने संकल्प करके उस तांदुलकी सब्जीको ग्रहण किया और तृप्तिका अनुभव किया तो उन महात्माओंको भी तृप्तिका अनुभव हुआ। वे कहने लगे किः “अब तो हम तृप्त हो चुके हैं, वहां जाकर क्या खाएंगे ? युधिष्ठिरको क्या मुंह दिखाएंगे ?” और वे सब चुपचाप वहांसे चले गए ।



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