बंगालके उच्च कोटिके संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस, एक दिन गंगा किनारे टहल रहे थे | साथमें उनके कुछ शिष्य भी थे |
नदीमें मछुआरे मछ्ली पकड रहे थे | स्वामीजी जालमें फांसी मछलियोंकी गतिविधि ध्यानसे देख रहे थे | उन्होंने देखा कुछ मछलियां जालमें निश्चल पडी हुईं थीं जैसे उन्होंने अपनी नियति स्वीकार कर ली हों | कुछ थीं जो जालसे निकलनेके लिए तडप रही थीं; परंतु उनके प्रयास कम पड रहे थे और इस कारण वे जालसे निकल नहीं पा रही थीं | कुछ ऐसी भी थीं जो अथक प्रयास कर जालसे मुक्त होकर जलमें क्रीडा कर रही थीं |
स्वामीजीने अपने शिष्योंको बतया कि इन मछलियों समान मनुष्यके भी तीन प्रकार होते हैं | कुछ ऐसे होते हैं जो सांसारिक मायाजलमें फंसनेके पश्चात निकलने हेतु प्रयास नहीं करते हैं | कुछ अन्य व्यक्ति भवसागरके बंधनोंसे मुक्त तो होना चाहते हैं परंतु उनके प्रयास इतने नहीं होते कि उसके बंधनको तोड सके | और तीसरे प्रकारके व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ होते हैं, वे अपने अथक प्रयासोंसे सांसरिक बंधनोंसे मुक्त हो जाते हैं और अपने बुद्धिको आत्मतत्तवमें स्थिर कर लेते हैं |
खरे अर्थोंमें ईश्वरप्राप्ति हेतु किए जानेवाले प्रयासको ही पुरुषार्थ कहते हैं और हमारा प्रारब्ध कितना भी तीव्र हो अपने पुरुषार्थद्वारा हम अपने प्रारब्धको मात देकर इस भवसागरको पार कर सकते हैं | अपने दुखोंका रोना रोनेवालेका क्रियमाण कर्मद्वारा प्रयास कम होते हैं क्योंकि उनकी तडप कम होती हैं !
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