मैकालेकी शिक्षण पद्धति और सरकारकी तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादने किस प्रकारके हिन्दुओंकी मानसिकताको जन्म दिया है, आईये एक झलक देखें !
१. अधिकांश पढे-लिखे हिन्दुओंको ‘हिन्दु’ कहनेमें लाज आती है वे अपने आपको ‘सेकुलर’ कहनेमें अधिक सहज और गर्व अनुभव करते हैं |
२. खरे अर्थोंमें बुद्धिजीवी वह होता है जो मानवताके उद्धार हेतु कृतिशील हो; परंतु आजके अधिकांश बुद्धिजीवी वर्ग समाज कल्याणकी अपेक्षा अपने और अपने बच्चोंके जीवनके कल्याण हेतु संपूर्ण जीवन व्यतीत कर देते हैं |
३. तिथि अनुसार पंचांग देखना और समझना यह उन्हें आधुनिकतासे परे ले जाता है ऐसा उनका मानना है |
४. अपने संस्कृति और संस्कारको मानना और उसका आचरण करना उसे वे आधुनिकीकरण (modernisation) के विरुद्ध मानते हैं |
५.जुआ खेलना मद्य पीना, स्त्रीको भोग्या समझना, संतोंकी निन्दा करना, देवी-देवताओंका उपहास करना, यह सब उनकी जीवन शैलीका अविभाज्य अंग होता है |
६. कॉन्वेंटमें शिक्षित हिन्दु अपने घरमें ईसा मसीहका चित्र रखते हैं , कुछ रोजा रखते हैं तो कुछ मजारपर जाते हैं , तो कुछ गौमांस खाते हैं, कुछ इफ्तार पार्टी रखते है, अंग्रेजीमें ही बोलना, पाश्चात्य संस्कृति अनुसार वस्त्र और भोजन शैली अपनाते हैं, उनके लिएयह सब धर्मनिरपेक्ष होना, समान है |
७. फिल्मी नट और विशेषकर स्त्री कलाकार अपने अंगका प्रदर्शन करना और पैसे कमाने हेतु किसी भी सीमा तक गिर जानेको professionalism और boldness कहती हैं |
८. मीडिया आधुनिकीकरणके नामपर सारी सीमायें तोड, liberalisation के नामपर सोफ्ट पोर्न को प्रस्तुत कर रहा है, स्थिति इतनी विकट है कि यदि हममे तनिक भी लाज हो तो आज धारावाहिकों और फिल्मोंकी बात तो छोड दें , समाचार पत्र और समाचार चैनलके समाचार अपने पिता और भाईके साथ बैठकर नहीं देख सकते हैं |
९. पाश्चात्य देशोंके लोग हिन्दु धर्म अपना रहे हैं और हिन्दु नेत्र मुंदकर तमोगुणी विदेशी संस्कृति अपना रहे हैं अर्थात बुद्धिभ्रष्टताकी सारी सीमाएं पार कर चुके हैं !
१०. धर्म सीखना और आचरण करना यह अब हिन्दुओंको व्यर्थकी बात लगती है |-तनुजा ठाकुर
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