ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं द्रष्टा दर्शनदृश्यभू : ।
कर्ता हेतु: क्रिया यस्मात् तस्मै ज्ञाप्त्यात्मने नमः ।। – श्री वशिष्ठदर्शनं (१-१-१)
अर्थ : ज्ञान रूपी उस परमतत्त्वको नमन है जो ज्ञानी हैं, ज्ञान है और जहांसे ज्ञानपाने वालेकी उत्पत्ति होती है वह भी हैं, उन्हें नमन है जो द्रष्टा हैं, दर्शन हैं और स्थूल दृश्य भी हैं, वे कर्ता हैं, हेतु हैं और क्रिया भी है ।
मानव धर्म अनुसार कर्तव्यसेवा एवं पदधिकारनिष्ठा का पलान एवं उपयोग लक्ष्यनुसार करना ओर करवाना चाहिए, देश हित में, समाज कल्याण में, मानवता रक्षण , आध्यात्मिक शिक्षण, दैवीय गुणों तत्वज्ञान जागृति, आदर्श चरित्र समर्पित। नैतिक मूल्यों के आधार पर विचार धारा, सात्विक चिंतन, धार्मिक स्मृति।