अष्टावक्र गीता


जनक उवाच :
कथं ज्ञानंवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।
वैराग्यं च कथं प्राप्त्मेतद् ब्रुहि मम् प्रभो ।। – अष्टावक्र गीता 

अर्थ : नृप एवं जिज्ञासु जनकके कहा
हे प्रभु कृपया मुझे सिखाएं, ज्ञानकी प्राप्ति कैसे हो ? मुक्ति कैसे प्राप्त हो ? और वैराग्यकी प्राप्ति कैसे हो ?
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अष्टावक्र उवाच :
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात् विषयान् विशवत्त्यज् ।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज् ।। – अष्टावक्र गीता

ऋषि अष्टावक्रने कहा : यदि आप मुक्तिकी इच्छा रखते हैं तो हे पुत्र, विषयोंके भोगको विष समझ कर  उसका त्याग करो और क्षमा, दया, स्पष्टवादिता, संतोष एवं सत्यको आत्मसात करो ।

 



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