उत्पादक ब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मद: पिता ।
ब्रह्म जन्म ही विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ।।- मनुस्मृति
अर्थ : जन्म देनेवाले और वेद विद्या पढानेवाले दोनों ही व्यक्ति पिता कहलाते हैं; परंतु वेद-विद्याके ज्ञानसे शिष्यका लौकिक और पारलौकिक जीवन दोनों ही सुधरता है; अतः वेद-विद्या देने वालेका महत्व अधिक है।
भावार्थ : माता-पिताके ऋणसे मुक्त होना कठिन है क्योंकि उन्होंने अनेक कष्ट उठाकर हमें जन्म देकर हमारा लालन-पालन करते हैं परंतु गुरु की शिक्षासे हमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है और हम पुनर्पि जन्मं पुनर्पि मरणमके चक्रसे मुक्ति पाते हैं अतः आत्मज्ञान देनेवाले पिता समान सद्गुरु, जन्म देनेवाले पितासे श्रेष्ठ होते हैं। माता-पिताकी सेवा, आज्ञापालन एवं उनके द्वारा दिये गए आशीषसे हमारे जीवनमें सद्गुरुका प्रवेश अधिक शीघ्र होता है।
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