परद्रवयेष्वभिध्यानम मनसाsनिष्टचिंतनं ।
वितथाभिनिवेषश्च त्रिविधम कर्म मानसं ।। मनुस्मृति (१२:५)
पराई धन संपत्तिको हथियानेकी चाह, दूसरे व्यक्तिके अनिष्ट की इच्छा और परलोकमें विश्वास न करना, ये तीनों मनद्वारा किए जानेवाले पाप हैं ।
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पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यम चापि सर्वश: ।
असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्ग्मयं स्याच्चतुर्विधम ।।मनुस्मृति (१२:६)
निरर्थक प्रलाप, चुगली करना, झूठ बोलना एवं कठोर वचन, ये सभी वाणीसे किए जानेवाले पाप हैं ।
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अदत्तानामुपादानम हिंसा चैव विधानतः ।
परदारोपसेवा च शरीरं त्रिविधम स्मृतम ।। मनुस्मृति (१२:७)
इस जगतमें तीन प्रकारके शारीरिक पाप कर्म हैं – अधर्मसे दूसरेका धन हडप लेना, शास्त्रोंका उल्लंघन कर की गयी हिंसा एवं परस्त्रीके साथ सहवास ।
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मानसं मनसे वायमुपभुंक्ते शुभाशुभं ।
वाचाsवाचा कृतम कर्म कायेनैव च कायिकम ।।मनुस्मृति (१२:८)
मनुष्यको मन, वचन कर्म द्वारा किए गए पाप कर्मोंका फल क्रमशः मन, वाणी और देहद्वारा भोगना पडता है।
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