निश्चित्य य: प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मण: ।अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित: उच्यते ।।- विदुर नीति
अर्थ : जो व्यक्ति कर्मको अपना कर्तव्य मानकर निश्चयसे आरंभ करता है, कर्मको मध्यमें नहीं छोडता और उसे समाप्त कर ही रहता है और जितेंद्रिय होता है, वही पंडित कहलाने योग्य होता है।
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