तस्माद्धर्मम् सहायार्थं नित्यं सङ्ग्चिनुयाच्छनै:।
धर्मेन हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।। – मनुस्मृति
अर्थ : शरीरको त्यागनेके पश्चात धर्म ही मात्र सहायक होता है; अतः आत्मकल्याण हेतु थोडा-थोडा कर धर्मका संग्रह करें । परलोकके घोर अंधकारसे भरे मार्गको जीव संचित धर्मकी सहायतासे ही पार कर सकता है।
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