कुछ साधक साठ प्रतिशत या सत्तर प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर कुछ महीनोंमें पाना है, जन्मदिन तक पाना है, इस प्रकारके ध्येय रखते हैं, उन्होंने यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चेको बडे होनेमें एक वर्ष लगते हैं | दरिद्रको धनवान होनेमें अनेक वर्ष लगते हैं | उसी प्रकार ४० या ४५ प्रतिशत से ६० या ७० प्रतिशत होनेमें अनेक वर्ष लगते हैं | आध्यात्मिक स्तर पानेमें उतावलापन नहीं होना चाहिए | उतावलापनके कारण अपने समक्ष रखे ध्येय यदि पूर्ण नहीं होता तो निराशा आती है | –परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले
इस विषयको समझने हेतु सर्वप्रथम संक्षेपमें स्तरानुसार साधना जान लें |
संपूर्ण सृष्टिका निर्माण ईश्वरने किया है अतः सजीव-निर्जीव सभीमें कुछ न कुछ मात्रामें सात्त्विकता रहती है और ईश्वरसे पूर्णत: एकरूप हुए संतोंकी सात्त्विकता सौ प्रतिशत होती है | मनुष्य योनिमें जन्म लेनेके लिए न्यूनतम सात्त्विकता बीस प्रतिशत होनी चाहिये | बीस प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरका व्यक्ति नास्तिक समान होता है उसे अध्यात्म, देवी देवता, धर्म इत्यादिमें कोई रुचि नहीं होती | तीस प्रतिशत स्तर होनेपर व्यक्ति कर्मकांड अंतर्गत पूजा-पाठ करना, तीर्थक्षेत्र जाना, स्त्रोत्र पठन करना जैसी साधना करने लगता है | पैंतीस प्रतिशत स्तर साध्य होनेपर खरे अर्थमें उसकी अध्यात्मके प्रति थोडी रुचि जागृत होती है और वह साधना करनेका प्रयास आरम्भ करता है | चालीस प्रतिशत स्तर होनेपर वह मनसे नामजप करनेका प्रयास करता है और पैंतालीस प्रतिशत स्तर आनेपर उसकी अध्यात्ममें रुचि बढने लगती है और अनेक प्रकारकी साधनासे एक प्रकारकी साधनामें उसका प्रवास आरम्भ हो जाता है | पचास प्रतिशत स्तर साध्य होनेपर वह व्यावहारिक जीवनकी अपेक्षा आध्यात्मिक जीवनको अधिक महत्व देने लगता है और अखंड नामजप करना, सत्संगमें जाना और सेवा करना जैसी आध्यात्मिक कृति निरंतरतासे करने लगता है | पचपन प्रतिशत स्तर साध्य करनेपर खरे गुरुका उसके जीवनमें प्रवेश हो जाता है और वह तन, मन धन तीनोंका पचपन प्रतिशत भाग किसी गुरुको, या गुरुके कार्यके लिए या धर्म कार्यके लिए अर्पण करने लगता है | साठ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरपर यथार्थमें सेवा आरम्भ होती है | इससे नीचेके स्तरपर मन एवं बुद्धिद्वारा विषय समझकर सेवा करनेका प्रयास करते हैं | सत्तर प्रतिशत स्तरपर साधक संतके गुरु पदपर आसीन होता है और अस्सी प्रतिशत आनेपर सदगुरु पदपर आसीन होता है और नब्बे प्रतिशत स्तरपर परात्पर पद साध्य हो जाता है | इसके पश्चात् वह जीवात्मा ईश्वरसे पूर्ण एकरूपता हेतु मार्गक्रमण करने लगती है | – तनुजा ठाकुर
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