सत्यनिष्ठ होकर धर्मके मार्गका अनुसरण करें


पूर्वे वयसि तत् कुर्याद् येन वृद्ध: सुखं वसेत् ।यावज्जीवेन तत् कुर्याद् येन प्रेत्यं सुखं वसेत् ।। – विदुर नीति

अर्थ : मनुष्यको चाहिए कि आयुके पूर्वार्धमें ऐसा कर्म करें जिससे वृद्धावस्थामें वे सुखी रहे और आजीवन ऐसे कार्य करे कि मृत्यु उपरांत परलोकमें भी सुखी रहे ।
भावार्थ : उपर्युक्त श्लोकके ठीक विपरीत आजकी युवा पीढी अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं तभी तो युवाकालमें कोई खेलमें अपने नैतिकताको बेच कर कारागारकी हवा खाता है तो कोई अपने युवावस्थामें आत्महत्या कर अपनी मानसिक दिवलियापनकी सभीको सूचना देते हैं। सत्यनिष्ठ होकर धर्मके मार्गका अनुसरण कर अर्थोपार्जन करते हुए जो अपने परिश्रम और योग्यता अनुसार मिले उसमें संतुष्ट रहनेसे हमारा भविष्य निष्कंटक व्यतीत होता है और हमारा परलोक भी सुधरता है, क्षोभकी बात यह है कि यह सामान्यसा सिद्धान्त हम स्वतंत्र भारतमें अपनी युवा पीढी मनपर अंकित नहीं कर पाये हैं ! आजके देशकी भ्रष्ट एवं अधर्मी वस्तुस्थिति, इस देशके सभी राज्यकर्ता, शिक्षाविद, समाजशास्त्री एवं धर्माचार्योंके प्रयासकी विफलताको दर्शाता है।

 



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