तृष्णा


सर्व संसार दोषाणां तृष्णैका दीर्घदु:खदा |
अन्तः पुरस्थ मपि य योजयत्यतिसंकटे || – श्री वशिष्ठदर्शनं (१-१७-३२)
अर्थ :
संसारके सर्व दोषोंमें तृष्णा सर्वाधिक दीर्घ कालके लिए कष्ट देता हैं | वह तो महलोंके अंतःपुरके निवासीको भी संकट दे सकता है |



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