श्रीगुरु उवाच


त्यागके कारण व्यष्टि साधना होती है समष्टि साधना नहीं होती |

कुछ व्यक्तिको लगता है कि तन, मन और धन त्याग किया है अतः हमारी आध्यात्मिक प्रगति तो निश्चित ही होगी | उन्हें यह ध्यानमें रखना चाहिए कि मात्र तन, मन और धनका त्याग पर्याप्त नहीं होता अपितु प्रीति ( निरपेक्ष प्रीति ) जैसा गुण भी होना चाहिए | त्यागके कारण मायाके प्रति आसक्ति अल्प होती है; परंतु गुण निर्माण नहीं होते हैं | ईश्वरके समान गुण निर्माण हुए विना ईश्वरसे एकरूप होना संभव नहीं | त्यागके कारण व्यष्टि साधना होती है और समष्टि साधना नहीं होती |  – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले

भावार्थ : साधनाके दो प्रकार हैं – व्यष्टि साधना और समष्टि साधना | व्यष्टि साधना अर्थात स्वयंकी आध्यात्मिक प्रगतिके लिए किए गए प्रयास | और समष्टि साधना अर्थात समाजको प्रेरित करनेके लिए प्रसार हेतु धर्मकार्य हेतु प्रयास करना  | तन मन और धनके त्यागके साथ प्रीति ( निरपेक्ष प्रेम ) का होना आवश्यक है | जिस प्रकार एक बूंद तेल और एक बूंद पानी एकरूप नहीं हो सकता उसी प्रकार यदि हमें ईश्वरसे एकरूप होना है तो उनके गुण हमें आत्मसात करने होंगे | प्रीति एक ईश्वरीय गुण हैं अतः साधकने इस गुण तो आत्मसात करनेके लिए प्रयास करना चाहिए | – तनुजा ठाकुर

 



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