नवरात्रोत्सव


आश्‍विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदासे नवमीतक मातृभाव एवं वात्सल्य भावकी अनुभूति देनेवाली, प्रीति एवं व्यापकता इन गुणोंके सर्वोच्च स्तरका दर्शन करानेवाली जगदोद्धारिणी, जगतका पालन करनेवाली शक्तिकी उपासना, व्रत एवं उत्सव मनानेकी कालावधि अर्थात नवरात्रि । आश्‍विन शुक्ल पक्ष १ को घटस्थापनाके उपरांत नवरात्रोत्सव आरंभ होता है । इस वर्ष नवरात्रोत्सव 13 अक्टूबरसे आरंभ हुआ है  । नवरात्रिमें मूल नक्षत्रपर सरस्वतीका आवाहन, पूर्वाषाढा नक्षत्रपर पूजन, उत्तराषाढा नक्षत्रपर बलिदान, श्रवण नक्षत्रपर विसर्जन करना चाहिए । शुक्ल अष्टमी एवं नवमी, ये महातिथियां हैं ।

इतिहास

अ. रामके हाथों रावणका वध हो, इस उद्देश्यसे नारदने रामसे इस व्रतका अनुष्ठान करनेका अनुरोध किया था । इस व्रतको पूर्ण करनेके पश्‍चात रामने लंकापर आक्रमण कर अंतमें रावणका वध किया।
आ. देवीने महिषासुर नामक असुरके साथ नौ दिन युद्ध कर, नवमीकी रात्रि उसका वध किया । उस समयसे देवीको ‘महिषासुरमर्दिनी’के नामसे जाना जाता है ।
भावार्थ : असुर शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है – ‘असुषु रमन्ते इति असुरः ।’ अर्थात ‘जो सदैव भौतिक आनंद, भोग-विलासितामें लीन रहता है, वह असुर कहलाता है ।’ आज प्रत्येक मनुष्यके हृदयमें इस महिषासुरका वास्तव्य है, जिसने मनुष्यकी आंतरिक दैवीवृत्तियोंपर वर्चस्व प्रस्थापित किया है । इस महिषासुरकी मायाको जानते हुए, उसके आसुरी बंधनोंसे मुक्त होने हेतु शक्तिकी उपासना आवश्यक है । इसलिए नवरात्रिके नौ दिनोंमें शक्तिकी उपासना करें ।

महत्त्व

अ. धर्मस्थापना हेतु देवी पुन: पुन: अवतरित होती हैं – ‘जगमें जब-जब तामसी, आसुरी एवं क्रूर लोग प्रबल होकर, सात्त्विक, उदारात्मक एवं धर्मनिष्ठ सज्जनोंको छलते हैं, तब देवी धर्मसंस्थापना हेतु पुन: पुनः अवतार धारण करती हैं । उनके निमित्तसे यह व्रत है ।’
आ. नवरात्रिमें देवीतत्त्व अधिक रहता है – नवरात्रिमें देवीतत्त्वका अत्यधिक लाभ लेने हेतु नवरात्रिकी कालावधिमें ‘श्री दुर्गादेव्यै नमः ।’ नामजप अधिकाधिक करना चाहिए ।

व्रत करनेकी पद्धति अनेक परिवारोंमें यह व्रत कुलाचारके रूपमें किया जाता है ।

अ. अष्टभुजा देवीकी और नवार्णव यंत्रकी स्थापना – घरके किसी पवित्र स्थानपर एक वेदी तैयार कर, उसपर सिंहारूढ अष्टभुजा देवीकी और नवार्णव यंत्रकी स्थापना की जाती है । अष्टभुजा देवी, शक्तितत्त्वका मारक रूप हैं । नवार्णव यंत्र पृथ्वीपर स्थापित देवीके विराजनात्मक आसनका प्रतीक है । यंत्रके समीप घटस्थापना कर, कलश एवं देवीका यथाविधि पूजन किया जाता है ।
आ. घटस्थापना एवं मालाबंधन – नवरात्रि महोत्सवमें कुलाचारके अनुसार घटस्थापना एवं मालाबंधन करें । खेतकी मिट्टी लाकर दो पोर चौडा चौकोर स्थान बनाकर, उसमें पांच अथवा सात प्रकारके धान बोए जाते हैं । इसमें (पांच अथवा) सप्तधान्य रखें । जौ, गेहूं, तिल, मूंग, चेना (राई), चावल और चने सप्तधान्य हैं ।
नवरात्रिमें नित्य करनेयोग्य कृत्य
१. जल, गंध (चंदनका लेप), पुष्प, दूर्वा, अक्षत, सुपारी, पंचपल्लव, पंचरत्न एवं स्वर्णमुद्रा अथवा सिक्के आदि वस्तुएं मिट्टी अथवा तांबेके कलशमें रखी जाती हैं ।
२. सप्तधान एवं कलश (वरुण) स्थापनाके वैदिक मंत्र यदि न आते हों, तो पुराणोक्त मंत्रका उच्चारण किया जा सकता है । यदि यह भी संभव न हो, तो उन वस्तुओंका नाम लेते हुए ‘समर्पयामि’ बोलते हुए नाममंत्रका विनियोग करें । माला इस प्रकार बांधें, कि वह कलशमें पहुंच सके । ‘अखंड दीपप्रज्वलन, उस देवताका माहात्म्यपठन (चंडीपाठ), सप्तशतीपाठ, देवीभागवत, ब्रह्मांडपुराणके ललितोपाख्यानका श्रवण, ललितापूजन, सरस्वतीपूजन, उपवास, जागरण आदि कार्यक्रमोंका आयोजन अपनी आर्थिक क्षमता एवं सामर्थ्यके अनुसार कर नवरात्र महोत्सव एवं दुर्गापूजा मनाएं ।’
३. नौ दिन प्रतिदिन देवीको नैवेद्य दिखाना – यद्यपि भक्तका उपवास हो, फिर भी देवताको सदाकी भांति अन्नका नैवेद्य दिखाना चाहिए ।
४. शास्त्रानुसार व्रतके दौरान उपासक उत्कृष्ट आचरणके एक अंगके रूपमें श्मश्रु न रखना (दाढी और मूछके तथा सिरके बाल न काटना), कडक ब्रह्मचर्यका पालन, पलंग एवं बिस्तरपर न सोना, गांवकी सीमा न लांघना, जूते-चप्पलोंका उपयोग न करना इत्यादिका पालन करता है ।

कुमारिका पूजनका महत्व

धर्मशास्त्रके अनुसार प्रतिदिन कुमारिकाओंकी पूजा कर उसे भोजन करवाएं । सुहागिन अर्थात प्रकट शक्ति व कुमारिका अर्थात अप्रकट शक्ति । प्रकट शक्तिका कुछ अपव्यय हो जाता है, अतएव सुहागिनोंकी अपेक्षा कुमारिकाओंमें कुल शक्ति अधिक होती है ।
कुमारीपूजाके विधान : नवरात्रिमें नौ दिन, प्रथम दिन एक अथवा प्रथम दिन एक, दूसरे दिन दो और नौवें दिन नौ, इस प्रकार बढते क्रमानुसार कुमारियोंको भोजन करवाना चाहिए, ऐसा विधान है । दो वर्षसे दस वर्षतक की कुमारियोंको बुलाया जाता है । प्रत्येक वर्णको अपने-अपने वर्णकी कुमारीको भोजनके लिए बुलाना चाहिए । वह निर्दोष, निरोगी एवं अव्यंग होनी चाहिए, ऐसा भी शास्त्रोंमें बताया गया है । देवीपूजनके उपरांत कुमारी-पूजा होती है । प्रथम उसका इस मंत्रसे आवाहन करते हैं ।
मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम् । नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम् ॥
अर्थ : मंत्राक्षरमय, लक्ष्मीस्वरूप, मातृकाओंका रूप धारण करनेवाली एवं साक्षात् नवदुर्गात्मिका, ऐसी कन्याका मैं आवाहन करता हूं ।
कुमारीपूजनके समय प्रथम कुमारीको सुशोभित चौकीपर बिठाते हैं । उसके पांव धोते हैं, उसे सुशोभित चौकीपर बिठाते हैं, उसे कुमकुमका तिलक लगाते हैं । उसे पुष्प, घाघरा(लहंगा)-चोली देते हैं एवं उसे फूलोंकी माला पहनाते हैं । उसे पंचामृत एवं मिठाईयां समर्पित करते हैं । तत्पश्‍चात् उसे आदि शक्तिका रूप मानकर भावपूर्ण नमस्कार करते हैं ।

नवरात्रि समापनकी कुछ विधियां

१. नवरात्रिकी संख्यापर बल देकर कुछ लोग अंतिम दिन भी नवरात्रि रखते हैं; परंतु शास्त्रानुसार अंतिम दिन नवरात्रि समापन आवश्यक है । इस दिन समाराधना (भोजनप्रसाद) उपरांत, समय हो तो उसी दिन सर्व देवताओंका अभिषेक एवं षोडशोपचार पूजा करें । समय न हो, तो अगले दिन सर्व देवताओंका       पूजाभिषेक

करें ।

२. देवीकी मूर्तिका विसर्जन करते समय बोए हुए धानके पौधे देवीको समर्पित किए जाते हैं । उन पौधोंको ‘शाकंभरीदेवी’का स्वरूप मानकर स्त्रियां अपने सिरपर धारण कर चलती हैं और फिर उसे विसर्जित करती हैं ।
३. स्थापना एवं समापनके समय देवोंका ‘उद्वार्जन (सुगंधी द्रव्योंसे स्वच्छ करना, उबटन लगाना)’ करें । उद्वार्जन हेतु सदैवकी भांति नींबू, भस्म इत्यादिका प्रयोग करें । रंगोली, बर्तन मांजनेके चूर्णका उपयोग न
करें ।
४. अंततः स्थापित कलश एवं देवीकी मूर्तिका उत्थापन (विसर्जन) किया जाता है ।
देवीसे आगे दिए अनुसार प्रार्थना करते हैं –‘ हे देवी, हम शक्तिहीन हैं; अमर्यादित भोग भोगकर मायासक्त हो चुके हैं । हे माता, आप हमें बल दें, आपकी शक्तिसे हम आसुरी वृत्तियोंका नाश कर पाएंगे ।’
गागर फूंकना : अष्टमीपर स्त्रियां महालक्ष्मीदेवीकी पूजा करते हैं एवं गागर फूंकते हैं ।
कुमारीपूजाके विधान : नवरात्रिमें नौ दिन अथवा प्रथम दिन एक, दूसरे दिन दो और नौवें दिन नौ, इस प्रकार बढते क्रमानुसार कुमारियोंको भोजन करवाना चाहिए, ऐसा विधान है । दो वर्षसे दस वर्षतककी कुमारियोंको बुलाया जाता है । प्रत्येक वर्णको अपने-अपने वर्णकी कुमारीको भोजनके लिए बुलाना चाहिए । शास्त्रोंमें बताया गया है कि वह निर्दोष, निरोगी एवं अव्यंग होनी चाहिए । देवीपूजनके उपरांत कुमारीपूजा होती
है । प्रथम उसका इस मंत्रसे आवाहन करते हैं ।
मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम् । नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम् ॥
अर्थ : मंत्राक्षरमय, लक्ष्मीस्वरूप, मातृकाओंका रूप धारण करनेवाली एवं साक्षात नवदुर्गात्मिका, ऐसी कन्याका मैं आवाहन करता हूं ।
कुमारीपूजनके समय प्रथम कुमारीको सुशोभित चौकीपर बिठाते हैं । उसके पांव धोते हैं, उसे सुशोभित चौकीपर बिठाते हैं, उसे कुमकुमका तिलक लगाते हैं । उसे पुष्प, घाघरा(लहंगा)-चोली देते हैं एवं उसे फूलोंकी माला पहनाते हैं । उसे पंचामृत एवं मिठाईयां समर्पित करते हैं । तत्पश्‍चात उसे आदि शक्तिका रूप मानकर भावपूर्ण नमस्कार करते हैं ।
(संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ – त्यौहार, धर्मिक उत्सव एवं व्रत एवं शक्ति)


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution