धर्मधारा


lakshmi mata1

ध्यान रहे, लक्ष्मी किसीके भी घर मात्र ४० वर्ष रहती हैं और तत्पश्चात ८० वर्षके लिए  वह वहांसे चली जाती हैं, और पुनः ८० वर्ष पश्चात आती हैं | यदि कोई इस चक्रसे बचना चाहता है, तो अपने धनको शुद्ध रखें | इस संदर्भमें स्कन्दपुराणमें एक श्लोक अत्यंत प्रेरणास्पद है |

न्या्योपार्जित वित्तस्यै दशमांशेन धीमत: ।
कर्तव्यो‍ विनियोगश्चत ईश्व र प्रीत्यंर्थमेव च ।। – स्कंदपुराण

अर्थात : धर्मके मार्गका अनुसरणकर, अर्जित धन भी तभी शुद्ध होता है, जब उसका दस प्रतिशत भाग ईश्वरीय कार्य, धर्म-कार्य या संत-कार्यमें अर्पण किया गया हो | लक्ष्मीकी कृपा हमारे घर एवं कुलपर सदैव रहे ऐसी हमारी इच्छा है, तो अपनी  आयका दशांश ईश्वरीय कार्यमें प्रतिमाह अवश्य अर्पण करना चाहिए | इससे पितर और अनिष्ट शक्तिद्वारा होनेवाले धनहानिसे हम सरलतासे बच सकते हैं, साथ ही घरमें रोग और शोकके प्रमाण घट जाते हैं | संत परमेश्वरके सगुण रूप होते हैं | अतः संतोंके कार्यमें धन अर्पण करनेसे हमारा संचित घटता है, अर्थात पाप और पुण्यका वह भाग जो हमें अगले जन्मोंमें भोगना है, वह नष्ट होता है और हम ईश्वरीय कृपाके पात्र  बनते हैं | जैसा कि स्कन्द पुराणमें लिखा है कि ईश्वरीय कार्यमें धन अर्पण करनेसे धन शुद्ध होता है | अतः जब हम भावनावश किसी अनाथालयमें या किसी दरिद्रको देते हैं, या पाठशाला या रुग्णालय बनवाते हैं, तो हमें पुण्य मिलता है और उसे भोगनेके लिए हमें पुनः जन्म लेना पड़ता है | साधकको  यह प्रयास करना चाहिए कि न ही नए पापकर्म और न ही नए पुण्यकर्म निर्माण हो, क्योंकि अध्यात्मशास्त्र अनुसार, पापको “पापात्मक पाप” और पुण्यको “पुण्यात्मक पाप” माना गया है, अर्थात दोनों ही बेड़ियां हैं, एक लोहे और दूसरी सोनेकी | अतः धनके त्यागका सरलसा शास्त्र जान लें | जिसमें त्यागकी प्रवृत्ति नहीं है, उसे भावनावश दरिद्रको, अनाथको, भिखारीको दान देनेका प्रयास करना चाहिए | जो इस प्रकारकी त्यागकर रहा है, उसे अगले चरणमें जाना चाहिए और संतोंको निरपेक्ष भावसे दान करना चाहिए | संतको हमारे धनकी आवश्यकता नहीं होती, उनके घर अष्ट महासिद्धियां खेलती हैं | अतः वे हमारा अंश मात्र धन स्वीकारकर, हमे कृतार्थ करते हैं | इस भावसे संतको धन अर्पण करना चाहिए |  ‘तेरा तुझको अर्पण’, यह भाव रख संतोंको (अपने गुरुको) प्रति माह यथासंभव धनका त्याग करना चाहिए और जब यह त्याग १० % से ५५% पहुँच जाता है, तभी ही कोई उच्च कोटिके संत हमें शिष्यके रूपमें स्वीकार करते हैं |-तनुजा ठाकुर



One response to “धर्मधारा”

  1. Denendra nath says:

    Highly appreciated. Dhanyavad for the great work and knowledge base.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution