पुराणादि शास्त्रों में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। प्रत्येक मास का यूं तो भिन्न भिन्न महत्व है मगर व्रत एवं तपकी दृष्टि से कार्तिक की अत्यधिक महिमा बताई गई है।
स्कंदपुराण के अनुसार-
‘मासानां कार्तिकः श्रेष्ठो देवानां मधुसूदनः।
तीर्थ नारायणाख्यं हि त्रितयं दुर्लभं कलौ।’
अर्थात् भगवान विष्णु एवं विष्णुतीर्थके सदृश ही कार्तिक मासको श्रेष्ठ और दुर्लभ कहा गया है। कार्तिक मास कल्याणकारी माना जाता है। कहा गया है कि कार्तिकके समान दूसरा कोई मास नहीं, सत्युगके समान कोई युग नहीं, वेदके समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजीके समान कोई तीर्थ नहीं है।
‘न कार्तिसमो मासो न कृतेन समं युगम्।
न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थ गंगया समम्।’
सामान्य रूपसे तुला राशि पर सूर्यनारायणके आते ही कार्तिक मास प्रारंभ हो जाता है। कार्तिकका माहात्म्य पद्मपुराण तथा स्कंदपुराणमें अति विस्तारसे उपलब्ध है। कार्तिक मासमें स्त्रियां ब्रह्म मुहूर्तमें स्नान करके राधा-दामोदरकी पूजा करती हैं। कलियुगमें कार्तिक मास व्रतको मोक्षके साधनके रूपमें बताया गया है।
पुराणोंके अनुसार इस मासको चारों पुरुषार्थों-धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको देने वाला माना गया है। स्वयं नारायणने ब्रह्मा को, ब्रह्माने नारदको और नारद ने महाराज पृथुको कार्तिक मासके माहात्म्यके संदर्भमें बताया है।
इस संसारमें प्रत्येक मनुष्य सुख, शांति और परम आनंद चाहता है। कोई भी यह नहीं चाहता कि उसे अथवा उसके परिवारजनोंको किसी प्रकारका कोई कष्ट, दुख एवं अशांतिका सामना करना पडे। परंतु प्रश्न यह है कि दुखोंसे मुक्ति कैसे मिले?
हमारे शास्त्रोंमें दुखोंसे मुक्ति दिलानेके लिए कई उपाय बताए हैं। उनमें कार्तिक मासके स्नान, व्रतकी अत्यंत महिमा बताई गई है। इस मासका स्नान, व्रत लेने वालोंको कई संयम, नियमोंका पालन करना चाहिए तथा श्रद्धा भक्तिपूर्वक भगवान श्रीहरिकी आराधना करनी चाहिए।
कार्तिकमें पूरे माह ब्रह्म मुहूर्तमें किसी नदी, तालाब, नहर या पोखरमें स्नान कर भगवानकी पूजा की जाती है।
इस मासमें व्रत करने वाली स्त्रियां अक्षय नवमीको आंवलाके वृक्ष के नीचे भगवान कार्तिकेयकी कथा सुनती हैं। कुंआरों-कुंआरियों एवं ब्राह्मणोंको आंवला वृक्षके नीचे विधिवत् भोजन कराया जाता है। वैसे तो पूरे कार्तिक मासमें दान देनेका विधान है।
स्कंदपुराणके वैष्णवखंडमें कार्तिक व्रतके महत्वके विषयमें कहा गया है-
‘रोगापहं पातकनाशकृत्परं सद्बुद्धिदं पुत्रधनादिसाधकम्।
मुक्तेर्निदानं नहि कार्तिकव्रताद् विष्णुप्रियादन्यदिहास्ति भूतले।’
अर्थात् इस मासको जहां रोगापह अर्थात् रोगविनाशक कहा गया है, वहीं सद्बुद्धि प्रदान करनेवाला, लक्ष्मीका साधक तथा मुक्ति प्राप्त करानेमें सहायक बताया गया है।
– कार्तिक मासमें दीपदान करनेकी विधि है। आकाश दीप भी जलाया जाता है। यह कार्तिकका प्रधान कर्म है।
– कार्तिक का दूसरा प्रमुख कृत्य तुलसीवन पालन है। वैसे तो कार्तिकमें ही नहीं, हर मास में तुलसीका सेवन कल्याणमय कहा गया है किंतु कार्तिकमें तुलसी आराधनाकी विशेष महिमा है।
एक ओर आयुर्वेद शास्त्र में तुलसीको रोगहर कहा गया है वहीं दूसरी ओर यह यमदूतोंके भय से मुक्ति प्रदान करती है। तुलसी वन पर्यावरणकी शुद्धिके लिए भी महत्वपूर्ण है। भक्तिपूर्वक तुलसीपत्र अथवा मंजरीसे भगवानका पूजन करनेसे अनंत लाभ मिलता है। कार्तिक व्रतमें तुलसी आरोपणका विशेष महत्व है। तुलसी विष्णुप्रिया कहलाती हैं।
– इसी तरह कार्तिक मास व्रत का तीसरा प्रमुख कृत्य है भूमिपर शयन। भूमि शयन करनेसे सात्विकतामें वृद्धि होती है। भूमि अर्थात् प्रभुके चरणोंमें सोनेसे जीव भयमुक्त हो जाता है।
– कार्तिकका चौथा मुख्य कार्य ब्रह्मचर्यका पालन बताया गया है।
पांचवां कर्म कार्तिकव्रतीको चना, मटर आदि दालों, तिल का तेल, पकवान, भावों तथा शब्द से दूषित पदार्थोंका त्याग करना चाहिए।
विष्णु संकीर्तनका कार्तिक मासमें विशेष महत्व है। संकीर्तनसे वाणी शुद्ध होती है।
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