अध्यात्म विचार :

मोमबत्तीका प्रकाश अर्थात भक्ति और अधिक तेज प्रकाश अर्थात योग योगीका तेज असहनीय होता है और भक्तिका अल्प सा प्रकाश मूल्य समझमें नहीं आता । योगीका तेज दिखाई देता है परंतु भक्तिका सामर्थ्य छिपा होता है। – संत भक्तराज महाराज
भावार्थ : यहां योगीका भावार्थ शक्तिके स्तरके संतोंसे है जिसका आध्यात्मिक स्तर 70% तक होता है , उसके आगे आनंदके स्तरके संत होते हैं जिन्हें सद्गुरु पदके संत कहते हैं और जिनका न्यूनतम आध्यात्मिक स्तर 80 प्रतिशत होता है और उसके आगे शांतिके स्तरके संत होते हैं जिन्हें परात्पर पदके संत कहते हैं जिनका आध्यात्मिक स्तर 90 % से अधिक होता है | संतोंके वाणीका गूढ भावार्थ होता है | सामान्य स्तरका व्यक्ति या साधक जिनका आध्यात्मिक स्तर 20 से 40% तक होता है वे सिद्ध और उसी सिद्धियोंके प्रति सहज आकृष्ट होते हैं ऐसे सिद्धोंका स्तर 40 से 60% प्रतिशत तक होता है | ऐसे योगीके चेहरेपर तेज होता है और भक्ति मार्गीके अर्थात उच्च कोटीके संतों के मुखपर सौम्यता और शांतता होता है | सर्व सामान्य व्यक्ति तेजकी ओर अधिक आकृष्ट होता है; क्योंकि आनंद और शांतिके सूक्ष्म स्पंदनकी उन्हें अनुभूति नहीं होती है और उससे उत्पन्न होनेवाली शक्तिका भाउन्हें भान नहीं होता |
संदर्भ : दैनिक मराठी सनातन प्रभात
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