वर्णानुसार दण्ड


एक बार राजा युद्धिष्ठिरके यहां एक किसानका प्रकरण आया । उसके खेतमें चोरी करते हुए चार लोग पकडे गये थे । उनमेंसे एक अध्यापक था, दूसरा कोतवाल, तीसरा व्यापारी और चौथा कारीगर । किसानने युधिष्ठिरसे उन्हें समुचित दण्ड देनेको कहा । युधिष्ठिरने कारीगरको एक माह, व्यापारीको एक वर्ष, सैनिकको पांच वर्ष और अध्यापकको दस वर्ष सश्रम कारावासका दंड दिया ।

जब लोगोंने एक ही अपराधके लिए चारोंको भिन्न-भिन्न दण्ड देनेका रहस्य पूछा, तो युधिष्ठिरने अत्यन्त तर्कसंगत एवं न्यायपूर्ण उत्तर दिया । उन्होंने कहा कि शिल्पी स्वयं निर्धन है, हो सकता है उसके घरमें भोजनके लिए अन्न न हो । ऐसेमें यदि उसने चोरी कर ली तो इसे अत्यधिक गम्भीर अपराध नहीं माना जा सकता; इसलिए उसे एक माहका कारावास पर्याप्त है ।
व्यापारीका अपराध कुछ अधिक है । उसे किसानकी फसलको उचित मूल्यपर क्रय और विक्रयका अधिकार तो है; परन्तु चोरीका नहीं; इसलिए उसे एक वर्षका दण्ड दिया गया ।
कोतवाल राज्यकी आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्थाका आधार है । यदि वह स्वयं ही चोरी करेगा तो चोरोंको पकडेगा कौन ?, यदि प्रजाका देशकी सुरक्षा व्यवस्थासे विश्वास उठ गया तो इस अराजकतासे निकलना राज्यके लिए भी सम्भव नहीं है; इसलिए उसे पांच वर्षका दण्ड दिया गया ।
जहांतक अध्यापककी बात है, उसका कृत्य केवल अपराध ही नहीं, जघन्य पाप भी है ! उसका कार्य है – देशकी नयी पीढिओंको सुसंस्कारित करना । यदि उसका आचरण अनुचित होगा तो वह नयी पीढिओंको क्या सिखाएगा ?; इसलिए उसका अपराध सबसे बडा है और उसे दस वर्षका दण्ड दिया गया है ।
हिन्दू धर्ममें सदैव ही दण्डका विधान वर्ण अनुसार दिया जाता रहा है । यह कथा उस तथ्यका स्पष्ट विवेचन करती है । हमारे अनेक धर्मशास्त्रोंमें एक ही प्रकारके अपराधके लिए उत्तम, मध्यम व अधम पुरुषोंके (भिन्न वर्णोंके) लिए भिन्न-भिन्न दण्डोंकी व्यवस्थाके विवेचन मिलते हैं; परन्तु कुछ अपराधोंका भी उल्लेख किया गया है, जिनमें दण्ड सबको समान दिया जाता है, जैसे – राजद्रोह । इससे ही हमारे यहांकी दण्डव्यवस्थामें कितने ही सूक्ष्म पक्षोंको समाविष्ट किया गया है, यह समझमें आता है । आगामी हिन्दू राष्ट्रमें दण्डनीति वैदिक धर्मशास्त्र आधारित होगी !
दण्डकी उत्पत्ति राज्यसंस्थाकी उत्पत्तिके साथ हुई । मनुस्मृति और महाभारतमें यह कहा गया है कि मानव जातिकी प्रारम्भिक प्रवृत्ति अत्यन्त पवित्र एवं सत्त्व प्रकृतिकी थी, जिसके कारण दोषरहित कर्म होते थे, तब न तो किसी राजाकी आवश्यकता थी, न राज्य था, न दण्ड था, न दण्डी था और सभी लोग ‘सोऽहं’ भावमें थे । (न राज्यं न च राजासीत न दण्डो न च दाण्डिकः । स्वयमेव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परं ॥)
कालके प्रवाहमें रज-तम गुणोंका प्राबल्य बढने लगा, मनुष्य समाज अपनी मूल प्रकृति, सत्त्व प्रकृतिसे दूर होने लगा और ‘मात्स्य न्याय’ (जहां बडी मछली छोटीको खाती है) छा गया । बलवान अशक्तको (कमजोरोंको) खाने लगे । ऐसी स्थितिमें राज्य और राजाकी उत्पत्ति हुई और सबको योग्यमार्गपर रखनेके लिए दण्डका विधान आरम्भ हुआ । दण्ड राज्यशक्तिका प्रतीक बना, जो सारी प्रजाका शासक, रक्षक तथा सभीके सोते हुए जागनेवाला था; अतः ‘दण्डनीति’को धर्मके अविभाज्य सिद्धान्तके रूपमें स्वीकार किया गया ।



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