पठन्ति चतुरो वेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः
आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा – चाणक्य नीति
अर्थ : चतुर व्यक्ति सारे वेदों और अनेक धर्मग्रंथोंको पढता है; परंतु उसे आत्मतत्त्वका ज्ञान नहीं हो पाता; जैसे कढ़छी जो भोजन पकानेमें सहायता करती है; उसे भोजनका स्वाद नहीं पता होता ।
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