भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे
कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः ।
अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः
चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि ।।
अर्थ : भगवान विष्णुके सर्वव्यापी स्वरूपको नमन है जिनका देह त्रिभुवन है , जिनके चरण यह पृथ्वी है , जिनकी नाभि गगन है, जिनकी सांसें वायु है, सूर्य और चन्द्रम जिनके नेत्र हैं, दिशाएं उनके कर्ण हैं , स्वर्ग उनका सिर है , अग्नि उनका मुख है और सागर उनका उदर(पेट) है । उनके इस सुन्दर स्वरूपमें ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके भिन्न देवता, मानव, पशु, पक्षी, गंधर्व एवं दैत्य विद्यमान हैं ।
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