किरातार्जुनीयम् महाकवि भारवि द्वारा सातवीं शती ई. में रचित महाकाव्य है जिसे संस्कृत साहित्यमें महाकाव्योंकी ‘वृहत्त्त्रयी’ में स्थान प्राप्त है। महाभारतमें वर्णित किरातवेशी शिवके साथ अर्जुनके युद्धकी लघु कथाको आधार बनाकर कविने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदिका मनोरम वर्णन किया है। यह काव्य विभिन्न रसोंसे ओतप्रोत है।
काव्यसौन्दर्य
निम्नलिखित पंक्तियोंमें चित्रालंकार देखिए-
न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु ।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत् ।।
अनुवाद : हे नाना मुख वाले (नानानन) ! वह निश्चित ही (ननु) मनुष्य नहीं है जो जो अपनेसे अशक्तसे भी पराजित हो जाए । और वह भी मनुष्य नहीं है (ना-अना) जो अपनेसे अशक्तको मारे (नुन्नोनो)। जिसका नेता पराजित न हुआ हो वह हार जानेके पश्चात भी अपराजित है (नुन्नोऽनुन्नो)। जो पूर्णतः पराजितको भी मार देता है (नुन्ननुन्ननुत्) वह पापरहित नहीं है (नानेना)।
यतो धर्मस्ततो जय: