जीवाणुओं – विषाणुओंका (Bacteria – Viruses) महाभारतमें उल्लेख


अवध्यः सर्वब्रह्मभूता अन्तरात्मा न संशयः

अवध्ये चात्मनि कथं वध्यॊ भवति केन चित !!१!!

यथा हि पुरुषः शालां पुनः संप्रविशेन नवाम
एवं जीवः शरीराणि तानि तानि परपद्यते !!२!!

देहान पुराणान उत्सृज्य नवान संप्रतिपद्यते
एवं मृत्युमुखं पराहुर ये जनास कर्मफलर्दर्शिनः !!३!!

ये चल एवं अचल ब्रह्माण्ड सभी प्रकारके प्राणियोंके लिए भोजन उपलब्ध कराता है, ये व्यवस्था श्रीहरिद्वारा विहित  की गयी है ! प्रतिदिन महान लोगोंद्वारा भी सूक्ष्म प्राणियोंका वध होता है; परन्तु इनका पाप उन्हें नहीं लगता, फलोंमें, जलमें, पूरी पृथ्वीपर असंख्य छोटे जीव होते हैं; अतः हम ये नहीं कह सकते कि उनका वध दिन-प्रतिदिन नहीं हो रहा है, ये परमात्माकी आज्ञा है, ये उन जीवोंका कर्मफल है, एक दृष्टिमें ये लग सकता है कि क्या योगियोंको उनके जीवनका समर्थन करना चाहिए? वे प्राणी तो हमारी पलकोंके गिरनेके साथ ही अपने प्राण त्याग देते है; परन्तु जैसे मैंने कहा कि वे इस प्रकार अपना कर्म फल भोगते हैं !



One response to “जीवाणुओं – विषाणुओंका (Bacteria – Viruses) महाभारतमें उल्लेख”

  1. jay prakash pathak says:

    Jai ho sanatan dharma jai ho Hindu.

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