राष्ट्र एवं धर्मके प्रति कर्त्तव्य सर्वोपरि है !


कुछ व्यक्ति मुझसे कहते हैं कि आप जन्म-ब्राह्मण हैं, अतः आप ब्राह्मण समाजके लिए कार्य करें, कुछ कहते हैं आप झारखण्डसे हैं; अतः आप झारखण्डके प्रगतिके लिए कुछ करें तो कुछ कहते हैं आप मिथिलाञ्चलसे हैं; अतः उसके उत्थानके लिए सहभागी हों ! तो ध्यान रखें, सर्वप्रथम राष्ट्र है और राष्ट्रका प्राण धर्म है; अतः धर्मके उत्थान हेतु इस पराकाष्ठाके प्रयत्न होने चाहिए, जिससे धर्माधिष्ठित राष्ट्रप्रणाली शीघ्र स्थापित हो जाए, एक बार यह हो गया तो वर्ण-ब्राह्मणोंको उनका सम्मान स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा और राष्ट्र सुदृढ हो गया तो राज्यका कल्याण स्वतः हो जाएगा और प्रान्तवाद तो राष्ट्रीय एकताको खोखला करती है; अतः मैं उस भावनाको बढावा देनेमें विश्वास नहीं रखती; परन्तु प्रान्तीय स्तरके संस्कृति, भाषा और लोक-परम्पराओंका संरक्षण एवं संवर्धन अवश्य होना चाहिए, इस हेतु राष्ट्रको एक सूत्रमें पिरोते हुए, प्रयास अवश्य होने चाहिए । समय आनेपर इस हेतु अवश्य यथासम्भव प्रयास करुंगी; परन्तु कालानुसार राष्ट्र रक्षण और धर्मजागृति व धर्मशिक्षणके प्रति कर्त्तव्यको प्राथमिकता देना, इस राष्ट्र एवं सनातन धर्मके अस्तित्वके लिए अति आवश्यक है एवं यह मेरा और आप सभीका मूलभूत धर्मकर्तव्य है । – तनुजा ठाकुर (२३-८-२०१३)



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