स्वतन्त्रता पश्चात लाठी-काठी, खड्ग संचालन (तलवारबाजी), मल्लयुद्ध (कुश्ती), भाला फेंक जैसे पुरुष प्रधान (मर्दाना) खेल आज नगरोंसे ही नहीं अपितु ग्रामीण क्षेत्रोंसे भी लुप्त हो रहे हैं । इन खेलोंकी विशेषता यह थी कि इनसे शरीर तो बलिष्ठ होता ही था, पुरुषोंमें क्षात्रवृत्ति जागृत रहती थी और विपरीत कालमें वे अपना एवं अपने स्वजनोंका दुर्जनोंसे रक्षण कर पाते थे । आज किसी स्त्रीके साथ पुरुष होते हुए भी वह चार दुर्जनोंसे न अपना रक्षण कर पाता है और न ही अपने साथ चलनेवाली स्त्रीके शीलका रक्षण कर पाता है ! अतः पुनः उन खेलोंका प्रचलन आरंभ करना, अब तो कालकी आवश्यकता हो गयी है । – तनुजा ठाकुर
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