श्री: सुखाय भगवन्दु:खायैव हि वर्धते ll गुप्ता विनाशनं धत्ते मृतिम् विषलता यथा ll – श्री वशिष्ठदर्शनं (१.१३.१०)
अर्थ : धन सुख भोगनेके लिए नहीं है । यह जब वृद्धिंगत होता है तो दुख लाता है और यदि इसका एकत्रीकरण किया जाए तो विनाश करता है, जैसे एक विषलता मृत्यु देती है ।
भावार्थ : ईश्वर हमें जो कुछ भी अधिक देते हैं, उसका उपयोग परोपकारके लिए करना चाहिए, चाहे वह धन हो, बुद्धि हो या कौशल्य हो । विशेषकर आवश्यकतासे अधिक धन यदि परोपकारमें न लगाया जाए तो वह दुखदायी हो जाता है और यदि उसका संचय किया जाए तो अपना सारा ध्यान उसकी सुरक्षा करनेमें ही निकल जाता है और धनकी अधिकता शत्रुको सहज ही आकृष्ट करती है, जो विनाश लाती है । धनकी विशेषता यह है कि वह सम्बन्धोंंमें भी खटास ला देता है और यहीं व्यक्तिका विनाश आरम्भ हो जाता है । – तनुजा ठाकुर
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