यो ध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवं परिषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव च ।।
– चाणक्य नीति
अर्थ : जो निश्चितरूपसे प्राप्त होनेवाला हो उसे छोडकर अनिश्चितकी ओर भागता है उसे जो निश्चित प्राप्त होनेवाला था वह भी नहीं मिलता और अनिश्चित तो वैसे भी अप्राप्य ही रहता है अर्थात दोनों में कुछ भी प्राप्त नहीं होता ।
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