गौरूपी धन अर्थात् गौधन हमारे पास उपलब्ध है जिसे हम पवित्र और मांकी उपमा देते हैं, किन्तु इस संबंधमें भी स्थिति विकट है । मात्र पूजन करनेके समय ही हमें पवित्र गौमाताका स्मरण होता है , अन्यथा तो अधिकांश व्यक्ति इसे एक पशुरूपमें ही देखते हैं ।
सामान्यत: व्यक्तियोंका यह पूर्वाग्रह है कि भारतीय प्रजातिकी गायोंकी दुग्ध उत्पादकता इतनी कम है कि यह २५० से ५०० ग्राम ही दूध दे सकती है । इसलिए दूधकी उत्पादकता बढानेका हमारे लिए श्रेष्ठ तरीका यही है कि विदेशी होल्सटीन फ्रीजियन या जर्सी नस्लके साथ घरेलू नस्लका क्रॉस करा दिया जाए । पचास वर्षोंसे हम ऐसा कर रहे हैं, और इसका दुष्परिणाम भी भुगत रहे हैं ।( रोगोंके रूपमें, भारतीय प्रजातिकी गायोंकी शुद्धता और दिव्यताकी क्षतिके रूपमें)
हमारे देशमें देशी गायोंकी कई प्रजातियां की उपलब्ध हैं । वे सभी इतनी अनुत्पादक, इतनी अनुपयोगी कैसे बन गईं ? विश्वमें सबसे छोटी वाइचूर जैसी प्रजाति, जिसे प्रतिदिन मात्रदो किलो चारेकी आवश्यकता होती है, हमारी धरतीसे प्रायः लुप्त हो गई है । विडंबना है कि यह प्रजाति इंग्लैंडकी रीडिंग यूनिवर्सिटी में संरक्षित है ।
भारतमें दूधारू पशुओंकी संख्या विश्वमेंमें सर्वाधिक, लगभग तीन करोड है । लगभग २७ में से हमारी आधी प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं । वर्ण-संकरताकी (क्रॉस-ब्रीडिंगकी) अधिकताके कारण हमारी लगभग ८०% गायें अपनी पहचान खो चुकी हैं । दूधके विषयमें प्रतिवर्ष आठ करोड टनसे अधिक उत्पादनके साथ विश्वमें हम अग्रणी हैं । अमेरिकाका स्थान दूसरा है । आधिकारिक रूपसे इसका श्रेय उच्च दूध उत्पादक नस्लोंके आयात और घरेलू प्रजातिके साथ उनकी क्रॉस-ब्रीडिंगको दिया जाता है, किन्तु क्या ये सच है कि हमारी गायोंकी दूध उत्पादकता बहुत कम है ? क्या ये प्रजातियां पूर्णतः अनुपयोगी हो चुकी हैं ? नहीं !!! ये मात्र षड्यंत्र पूर्वक स्थापित किया गया कथित सत्या है !!! राजस्थानकी थारपारकर प्रजातिका उदाहरण लीजिए । इसका नाम ही थार,पार,कर है, अर्थात् यह थार(राजस्थानका मरुस्थल) को पार कर सकती है । जर्सी या होल्सटीन फ्रीजियन नस्लकी गायको एक किलोमीटर चलानेका प्रयास कीजिए, आपको सत्यताका भान हो जाएगा !
कुछ माह पूर्व एफएओके एक अध्ययनमें यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि ब्राजील भारतीय प्रजातिकी गायोंके निर्यातमें सबसे आगे है । क्या कहीं कुछ अनुचित नहीं हो रहा है ? ब्राजील हमारे यहांकी गौओंके संवर्धनमें हमसे भी आगे है । १९६०के दशकके प्रारम्भमें ब्राजीलने भारतकी छह प्रजातियां आयात कीं थीं ।
वस्तुतः भारतीय गायें जब ब्राजील पहुंचीं तब ज्ञात हुआ कि ये दूध देनेमें भी आगे हैं । आज छह में से तीन प्रजातियां गुजरातकी गिर और आंध्रप्रदेश तथा तमिलनाडूकी कांकरेज व ओंगोल वहां होल्सटीन फ्रीजियन व जर्सीके बराबर दूध दे रही हैं । यदि हम इसी भांति निद्रामग्न रहे तो ब्राजीलसे भारतमें गायोंका आयात होने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए !!!
यदि हम(शासनभी) ध्यान देते तो हमारी गाय सडकोंपर भटकने वाला आवारा पशु नहीं मानी जाती अपितु एक उच्च दूध उत्पादक सम्मानीय प्राणी होती । विज्ञानके कारण जो क्षति देशमें हुई है, उनमें यह सबसे बडी है । अब समय आ चुका है कि पारंपरिक पशुपालक अपने गौधनका मूल्य समझें । न केवल इनके संरक्षण अपितु आर्थिक प्रगतिके संसाधनके रूपमें इनके उपयोगके लिए देशव्यापी कार्यक्रम प्रारम्भ करें ।
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