पर्यावरण-रक्षक गौमाता


 

पर्यावरण केवल बुद्धिजीवियोंकी गोष्ठियोंका विषय ही नहीं है, वस्तुतः यह जीवन शैली है । वायु, पानी और धूपको नैसर्गिक सौन्दर्यके साथ जोडनेवाली विचार शुद्धता मंत्र है और यह हमें सिखाता है गोवंश । गोमय या गोबर तो सोनेकी खान है । गायके गोबरको जलानेसे एक क्षेत्र विशेषका तापमान कभी एक सीमासे ऊपर नहीं जाने पाता । भोजनके पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते । धुआं हवामें स्थित विषाणुओंको नष्ट करता है । गायके गोबर और मिट्टीका मिश्रणसे लिपाई  घरोंके लिए एंटीसेप्टिकका कार्य करता है  एवं सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंके आक्रमणसे बचाता है  ।

घर कीडों, मक्खियों, मच्छर और सांपोसे मुक्त हो जाते हैं । गायके गोबरकी खादसे रासयिनक खाद और कीटनाशकोसे होनेवाला प्रदूषण नष्ट किया जा सकता है । यह प्रभावी प्रदूषण नियन्त्रण है । गायके गोबरसे सौर विकिरणका प्रभाव नष्ट किया जा सकता है । गोबरका छिडकाव कूडेके ढेरसे दुर्गन्ध भी हटा सकता है ।

गोबरके कंडेमे विषाणुनाशक तत्त्व होते हैं । यह प्लेग निवारक भी है । गोबर मे “एंटिसेप्टिक तथा एटी”-रेडियोथर्मल गुण होता है । साथ ही १६ उपयोगी खनिज भी होते हैं । कूडे-कचरेसे खाद बनानेसे लेकर सूखे तेलके कूएंमें पुनः तेल लानेके लिए गोबरका उपयोग किया जाता है । यदि देशके समस्त गोवंशके गोबरका बायोगैसके संयत्रमें उपयोग किया जाए तो वर्तमानमें ईंधनके रूपमें जलाई जा रही ६ करोड ८० लाख टन लकडीकी बचतकी जा सकती है । यह वातावरण शुद्ध कर भू उर्वरता बढाता है । नीमसे मिलकर जैव-कीटनाशकके रूपमें अत्यन्त फलदायी होता है ।

देशी गाय अपनी निश्रवाससे आक्सीजन छोडती है । जो मनुष्य एवं पर्यावरनको स्वस्थ रखती है । वर्तमानमें वायु, जल, ध्वनिके साथ खाघ-प्रदूषण चिन्तनीय है । कृषि-रसायनोंके दूरगामी परिणामोंमें गर्भपात, विकलांगताकी भी चर्चा हो रही है । बालोंका श्वेत(सफेद) होना, लैंगिक असन्तुलन, प्रजनन प्रणालीमें विकृति एवं कर्करोग(कैंसर) के पीछे कीटनाशकोंका अनियन्त्रित उपयोग है । रासायनिक खादका मात्र ३० प्रतिशत ही मिट्टीमें घुल पाता है । शेष पत्थर भांति यथावत रहकर मिट्टीको ऊसर(बंजर) बनाता है । विश्वकी ५२ प्रतिशतसे अधिक भूमि ऊसर हो चुकी है । पुनः इसे उर्वर बनानेका एकमात्र उपाय गौमाताकी ओर मार्गक्रमण करना है  । इस हेतु गौ संरक्षण एवं गौ संवर्धन करना परम आवश्यक है |



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