गोमाताद्वारा अर्थव्यवस्थाको सुदृढ करना सम्भव
भारतीय संस्कृति ही नहीं वरन् हमारी अर्थव्यवस्था भी प्राचीन कालसे गौ आधारित रही है । गौमाता अपने जीवनमें तथा जीवनके पश्चात् भी हमारी अर्थव्यवस्था हेतु अत्यंत उपयोगी रही है । यदि विचार करें तो गायके गोबरके सदुपयोगसे ही हम अपने देशका ऋण उतार सकते हैं और वह भी सरलतासे । उर्वरकके (खाद) रूपमें हम मात्र गायका अथवा गौवंशका गोमय (गोबर) प्रयोग करें तो विदेशोंसे यूरिया, रासायनिक खादों, कीटाणुनाशकोंका आयात निरुद्ध (बन्द) कर सकते हैं । यूरिया, रासायनिक खाद और कीटाणुनाशक भूमिकी उर्वरा शक्तिको नष्ट करते हैं तथा भूमिकी स्वाभाविक आर्द्रताको (नमीको) घटाते हैं; फलस्वरूप भूमिको सामान्यसे चार गुणा अधिक जलकी आवश्यकता होती है । देशमें भू जलस्तर घटनेका यह भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है । रासायनिक खाद भूमिके लिए व्यसन समान हैं जिसके नित्य उपयोगसे भूमिकी उत्पादकताका सतत् क्षरण होता है । इनके निरंतर प्रयोगसे भूमिको इनका व्यसन (लत) लग जाता है और भूमिको उत्तरोत्तर वर्षोंमें (साल-दर-साल) पूर्वसे अधिक कीटनाशक एवं रासायनिक उर्वरकोंकी आवश्यकता होती है । साथ ही इनके प्रयोगसे मिट्टीको उर्वरा (उपजाऊ) बनानेवाले जीव-जन्तु, जीवाणु आदि मर जाते हैं । जब कृषक केंचुएंको मारते हैं, भंवरेको मारते हैं, तितलीको मारते हैं तो सहस्रों (हजारों) और समस्याओंका सामना करना पडता है । इसके अतिरिक्त इनके प्रयोगसे शरीरमें कर्करोगकी (कैंसर) आशंका बढ जाती है । उदर (पेट) तथा त्वचा संबंधी विकार उत्पन्न हो जाते हैं । यह जानकारी आपके लिए आश्चर्यजनक एवं अविश्वनीय होगी कि कीटाणुनाशकोंके सीधे प्रयोगसे प्रतिवर्ष ३०००० से अधिक किसानोंकी मृत्यु हो जाती है; किन्तु यह सत्य है । यदि हम गायके गोबरका उर्वरकके रूपमें प्रयोग करें तो इस जनहानिको रोक सकते हैं । उदाहरणके लिए हम मृत गायके सींगमें गोबरभर कर दो सप्ताहके लिए उसे धरतीमें गाढ दें । दो सप्ताह पश्चात् सींगमें भरे गोबरको पानीमें घोलकर खेतोंमें डालें तो दस एकड खेतोंके लिए उर्वरककी आपूर्ति हो सकती है । इसी प्रकार गोमूत्र अत्युत्तम कीटनाशक है । हम गोबर और गोमूत्रपर अपनी कृषिको केन्द्रित करें तो पूरी अर्थव्यवस्थामें पुनः क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा ।
यदि हम अपने जीवनसे पशुधनको हटा दें तो हमारी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी । (विगत वर्षोंमें वैश्विक मंदीका प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्थापर न्यून पडनेका यह एक बडा कारण है कि हमारी अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है) हम जो शाक (सब्जी) खाते हैं अथवा अन्न क्रय करते हैं उसका मूल्य कई पट (गुणित) बढ जाएगा; क्योंकि गांवोंसे सब्जियां तथा अनाज गौवंश (बैलों) एवं अन्य पशुधनकी पीठ पर लदकर नगरमें आती हैं । यदि इन्हें भारी वाहनोंसे लाया ले जाया जाए तो ईंधनके मूल्यमें अत्यधिक वृद्धि हो जाएगी और आप समझ सकते हैं कि तदुपरान्त अर्थव्यवस्थाकी कैसी दुर्गति होगी ?
यदि गोवंशको वृद्ध या अनुपयोगी समझकर वधशालामें (वस्तुतः हत्या-शाला) कटनेके लिए भेज दिया तो सम्पूर्ण भूस्वामित्व व्यवस्थामें परिवर्तन करना होगा । खेत जोतनेके लिए ट्रैक्टर लाने होंगे । प्रत्येक कृषक (किसान) के लिए संभव नहीं कि वह ट्रैक्टर क्रय कर पाए । यदि गोवंश समाप्त हो गया तो छोटे किसानोंकी भूमि बिना जोती हुई रह जाएगी । जबकि देशमें एक बडे भू-भागपर छोटे किसान कृषि करते हैं । इस प्रकार हमारी अर्थव्यवस्था गायके उपयोगपर आधारित है । इसीलिए हम इसे “मां” कहते हैं, केवल दूधके कारण उसे मां नहीं कहते । हमारी अर्थव्यवस्थाका मूल (जड) उद्योगोंमें नहीं, अपितु गौमातामें है । गौमाताका संरक्षण एवं संवर्द्धन ही हमारी अर्थव्यवस्थाके उज्ज्वल भविष्यकी प्रतिभूति (गारंटी) है ।
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