कुसुमं वर्णसंपन्नंगन्धहीनं न शोभते ।
न शोभते क्रियाहीनं मधुरं वचनं तथा ।।
अर्थ : जिस प्रकार सुगंध विरहित पुष्प शोभायान नहीं होता ( पुष्पमें यदि सुगंध हो तो उसकी उपयोगिता अधिक होती है) उसी प्रकार अकर्मण्य व्यक्तिके मधुर वचन प्रसंशनीय नहीं होते । कहनेका तात्पर्य है कि मात्र सुमधुर वचनोंसे कोई प्रिय नहीं होता, उनके कर्म भी उनके वचनोंके अनुरूप होने चाहिए और इस हेतु सुभाषितकार कहते हैं कि यदि पुष्प अपने सुगंधको नहीं फैलाता है तो उसे सुंदर स्वरूपका क्या महत्त्व है ? पुष्पका सुंदर रंग उसके बाह्य स्वरूपका प्रतीक है और सुगंध उसका गुणधर्म है | गुणहीन एवं अकर्मण्य व्यक्तिकी अपेक्षा कर्मठ एवं गुणी व्यक्ति अधिक सम्मानके पात्र होते हैं ।
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