शिष्यकी पात्रता, उसकी गुरुभक्ति एवं स्तरके अनुसार गुरुतत्व कार्य करता है !


 

एक बार एक दम्पतिको लगा कि बच्चोंने अपने उत्तरदायित्व उठा लिए हैं अतः अब अधिक समय साधनामें देना चाहिए एवं वे ग्रंथोंका पारायण करने लगे | ग्रंथोंको पढनेपर उन्हें बोध हुआ कि बिना गुरुके खरा ज्ञान नहीं मिलता; अतः उन्होंने सोचा अब गुरु धारण करना चाहिए; परन्तु गुरुको कहां ढूंढें इस सोचमें दोनों पड़ गए | पतिने पत्नीसे रात्रिमें सोते समय कहा ” कल ब्रह्ममुहूर्तमें हम उठ जायेंगे और स्नान, ध्यान कर द्वारके पास खडे हो जायेंगे जो पहला व्यक्ति मिलेगा उसे ही हम अपना गुरु बना लेंगे पत्नी धर्माचरणी थी; अतः पतिके बातको सहर्ष स्वीकार कर सो गयी | अगले दिवस प्रातः अपने नियोजन अनुसार दोनों स्नान ध्यान कर गुरुकी आसमें द्वारपर हाथ जोड खड़े हो गए | उस रात्रि एक चोर जो चोरी करने निकला था उसके हाथ कुछ न लगा था और वह निराश होकर जा रहा था तभी इस दम्पतिने चोरको बुलाया और उसे नमस्कार कर बोले “आप हमारे गुरु हैं, हमारा प्रणाम स्वीकार करें” , यह कह दोनों चोरके चरण स्पर्श किये | चोरने सोचा कोई मूर्ख है, ऐसे कोई किसीको कोई गुरु बनाता है क्या, चलो इन्हें ठग लेते हैं |” चोरने कहा ” ठीक है यदि मैं तुम्हारा गुरु हूं तो  मैं जैसे कहूं वैसा करना ” दोनों पति-पत्नीने हामी भरी | चोरने सोचा क्यों न ने भोलेपन का लाभ उठाकर इन्हें लूट लिए जाए; अतः चोरने दोनोंको मुर्गा बननेका आदेश दिया और कहा तुम दोनोंने मुझे अपना गुरु माना है; अतः जैसा आदेश दूं वैसा ही करो जब तक मैं न उठनेको न कहूं मुर्गा बने झुके रहो, पतिने पत्निसे कहा “शिष्यने गुरुकी आज्ञापालन करनी चाहिए; अतः जैसा गुरुजी कहते हैं वैसा ही हम करेंगे , चाहे प्राण क्यों न चले जाये” , पत्निने भी हामी भरी | चोर, दोनोंको मुर्गा बना उनके तिजोरी वाले कक्षमें जाकर उसका ताला तोड सब कुछ ले भाग गया | झुककर मुर्गा बने हुए रहनेसे दोनों पति-पत्नीके नाक और मुहंसे खून बहने लगा परन्तु दोनों ने ठान रखी थी जब तक गुरुजी नहीं बोलेंगे तब तक उठेंगे नहीं ! यह सब देख नारायण विह्वल हो उठे उनसे रहा नहीं गया उन्होंने प्रकट होकर कहा “तुम जिसकी आज्ञा का पालन कर रहे हो वह चोर था तुम्हारे घर की तिजोरीसे सब लेकर भाग गया अब तुम दोनों उठ जाओ, पतिने कहा ” आप नारायण हो या कोई और जब तक हमारे गुरु नहीं कहेंगे हम टस से मस नहीं होंगे चाहे, प्राण ही क्यों न चली जाए |” भगवान नारायणको लगा कि यदि इस भक्तके प्राण निकल गए तो भक्तों की गुरुसे आस्था ही टूट जाएगी और कोई अपनी गुरुकी आज्ञा का पालन नहीं करेगा अतः वे तुरंत चोरके पास गए और कहने लगे “तुम्हे ध्यान है या नहीं वहां एक दम्पतिके कुछ क्षणोंमें प्राण निकलनवाले है “, चोरने कहा, ” तुम कौन हो वेशभूषासे तो नारायण दिखते हो, भगवानने कहा ” हां, मैं भक्तवत्सल नारायण हूं, तुमने मेरे भक्तके प्राण संकटमें डाल दिए अब वे मेरी बात नहीं मान रहे कुछ करो कहीं उनके प्राण चले गए तो सत्यानाश हो जायेगा और गुरु तत्त्वपर सबका विश्वास सदाके लिए  उठ जायेगा ” चोरको अपनी चूक का भान हुआ और वे दोनों तुरंत अंतिम सांसे गिन रहे उस दम्पतिके पास पहुंचे चोरने उनके चरण स्पर्श कर कहा ” हमें क्षमा कर दो हमने तुम्हारे भोलेपनका लाभ उठा, तुम्हें  ठगना चाहा; तुम्हारी गुरुभक्तिके कारण आज मुझे साक्षात नारायणके दर्शन हो गए तुम्हारी गुरु भक्तिमें ब्रहमांड हिलानेकी शक्ति है हम तुम्हारे गुरुके योग्य नहीं हमें क्षमा कर दो , इतना कह चोर रोने लगा | दोनों पति-पत्नीने खडे होकर भगवान श्री नारायणको प्रणाम किया और नारायणने अपनी कृपाका वर्षाव कर दोनोंको कुछ क्षणमें ही पूर्व रूप स्वस्थ कर दिया |



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