स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा
विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः ।
विशेषतः सर्वविदां समाजे
विभूषणं मौनमपण्डितानाम्॥ – भर्तृहरेः सुभाषितसंग्रह
अर्थ : ब्रह्माने सभीके लिए उपलब्ध एक गुण निर्माण किया है और वह है मौन । अज्ञान छिपानेके लिए मौन रूपी एक गुणरूपी आवरण बनाया है; विशेष कर ज्ञानियोंकी सभामें मूर्खोके लिए मौन अलंकार समान है ।
भावार्थ : मौन मात्र मूढों हेतु ही नहीं अपितु ज्ञानियोंके लिए गुण है । एक वाक्य बोलनेमें हमारी दो प्रतिशत शक्ति व्यय हो जाती है, इससे समझमें आता है कि वाचालताके कारण हम अपनी कितनी शक्तिका अपव्यय करते हैं ।जहां आवश्यक हो और जितना आवश्यक हो उतना ही बोलना चाहिए और जहां हमसे अधिक ज्ञानी हों वहां तो मौन धरण करनेसे हमारी सुननेकी और सीखनेकी वृत्ति दोनों ही निर्मित होती है । व्यावहारिक जीवनमें भी एक संताप हमारे जिह्वापर नियंत्रणके कारण होता है अतः मौनसे सभी परिस्थितिमें, सभीको लाभ मिलता है । –तनुजा ठाकुर
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