आजकी पीढीको चरित्र रक्षणके विषयमें बाल्यकालसे ही संस्कारित नहीं किया गया; फलस्वरूप आजकी युवा पीढीका चारित्रिक पतन इस देशके सामाजिक शास्त्रियोंके लिए चिन्ताका विषय बन चुका है । शास्त्र कहता है –
यथा हि मलिनै: वस्त्रै: यत्र कुत्र उपविष्यते । वॄतत: चलितोपि एवं शेषं वॄतं न रक्षति ।।
अर्थात जिसप्रकार मैले वस्त्रवाले कहीं भी बैठ जाते हैं तो उन्हें कुछ भी अन्तर नहीं पडता, उसीप्रकार चरित्रका हनन एक बार हो गया तो वह और नीचे गिरता ही जाता है; अतः प्रथम बार ही सतर्क रहना चाहिए । जैसे वर्षामें यदि हम स्वच्छ वस्त्र पहनकर निकलते हैं तो अपनेको कीचडसे बचानेका प्रयास करते हैं; परन्तु यदि एक बार किसी कारण कीचड और वर्षासे वह वस्त्र मैला हो जाए तो हम पुनः उसके बारेमें विचार नहीं करते हैं । उसीप्रकार चरित्रका भी रक्षण आरम्भमें सतर्क होकर करना चाहिए । इस हेतु बाल्यकालसे ही चरित्र रक्षणके संस्कार अंकित करने चाहिए । हमारी संस्कृतिमें चरित्र रक्षणको इतना महत्त्व दिया गया था कि चार आश्रमोंमेंसे प्रथम आश्रमका नाम ही ब्रह्मचर्य आश्रम दिया गया था । आगामी हिन्दू राष्ट्रके शिक्षण प्रणालीमें ब्रह्मचर्यका महत्त्व अन्तर्भूत किया जाएगा एवं इसका पालन विद्यार्थी वर्ग एवं युवा पीढी कर सकें, इस हेतु उन्हें साधना सिखाई जाएगी ।
इसका बहुत अच्छा उदाहरण है, आजके चित्रपट जगतकी अभिनेत्रियां । वे एक बार अंग प्रदर्शन करनेवाले वस्त्र पहनकर कोई चलचित्र कर लेती हैं तो उसके पश्चात् वे निर्लज्ज हो जाती हैं और उसके पश्चात् तो वे अपनी सर्व सीमाओंको लांघ कर समाजमें भी अश्लील वस्त्र पहन कर उच्छृंखलता फैलाती हैं और प्रथम बार ही ऐसा करनेसे वे अपनी नैसर्गिक स्त्री-सुलभ लज्जाको वे सदैवके लिए खो देती हैं । उसी प्रकार आज अनेक विद्यार्थी ब्रह्मचर्यका महत्त्व नहीं जानते हैं और विवाहसे पूर्व एक बार अपने क्रियमाणसे कौमार्य भंग कर ले तो वे उसके पश्चात वे अपने चरित्रके विषयमें पुनः कभी विचार नहीं करते हैं और वे पतनके मार्गकी और अग्रसर हो जाते हैं । – तनुजा ठाकुर
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