यं त्वार्याः क्रियमाणं प्रशंसन्ति स धर्मो यं गर्हन्ते सोsधर्मः । – (आपस्तम्ब धर्म सूत्र १:७ :९)
अर्थ : सत्पुरुष जिस आचारका स्वयं पालन करते हुए प्रशंसा करते हैं, उसका अनुमोदन करनेका परामर्श देते हैं, वह धर्म है और जिस आचारकी निन्दा करते हैं तथा स्वयं भी उसका आचरण नहीं करते वह अधर्म है ।
भावार्थ : धर्मकी अनेक परिभाषा है उसमें उपर्युक्त सुवचन भी धर्मकी एक परिभाषा कही जा सकती है। सत्पुरुषद्वारा किए गए योग्य आचरण ही हमारे लिए धर्म हैं। – तनुजा ठाकुर
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