श्रीगुरु उवाच


हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना केवल संतोंके संकल्प एवं अस्तित्वके कारण होनेवाली है !
हम हिन्दुराष्ट्रकी स्थापना हेतु कार्यरत हिन्दुत्त्ववादी कार्यकर्ता और नेता इनका कार्य तथा संतोंद्वारा किया जानेवाला कार्य इनमें आकाश-पातालका अंतर निम्नप्रकार है । ध्यान रहेकी संतोंमें भी भिन्न प्रकार हैं, यहां उल्लेखित संत उच्च कोटिके हैं ।

१. कार्यकर्ता : ये मन एवं स्थूल देहके स्तरपर कार्य करते हैं ।

२. नेता : ये बुद्धिके स्तरपर कार्य करते हैं ।

३. संत : संत अर्थात् ईश्वरका सगुण रूप । ईश्वरके समान उनका कार्य सूक्ष्मसे चलता है, जो बुद्धि अगम्य होता है । यह कार्य दो स्तरोंपर होता है ।

अ. संकल्प : ईश्वरके संकल्पमात्रसे अनंत कोटि ब्रह्मांडकी निर्मिति हुई । उसी प्रकार कुछ संतोने हिन्दुराष्ट्र स्थापनाका संकल्प किया है। इस हेतु उन्होंने केवल आशीर्वाद ही नहीं दिया वे तो इसके लिये अखंड अनुष्ठान भी कर रहे हैं । पूर्वकालके ऋषि यज्ञ करते थे उसी प्रकार संतोंका अनुष्ठान करते हैं ।

आ. अस्तित्व : ईश्वरके अस्तित्वमात्रसे अनंतकोटि ब्रम्हाण्डोंका कार्य चलता है । सूर्यके केवल अस्तित्वमात्रसे प्रतिदिन भोर होनेपर मनुष्यके साथ ही पशु-पक्षी कार्यरत होते हैं, उसी प्रकार संतोंके अस्तित्वमात्रसे हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना होने वाली है। सारांश यह है कि संतोंके केवल संकल्प एवं अस्तित्वसे हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना होनेवाली है, हम जो करते हैं, वह मात्र हमारी साधना है ।

हिन्दुराष्ट्रकी स्थापनाके कार्यमें हमारा महत्त्व मात्र ३० प्रतिशत है, तो संतोंके कारण ७० प्रतिशत कार्य होनेवाला है । इन दोनों कार्योंमें भेद यह है कि हमारा कार्य सबको दिखाई देता है तो संतोंका कार्य सूक्ष्मसे अर्थात् पंचज्ञानेंद्रियोंके मन एवं बुद्धिके परे होनेके कारण हमारी समझमें नहीं आता । ऐसे संतोंमेंसे १० हमें ज्ञात हैं और भी अन्य संत कार्यरत हैं । -परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले (१७.६.२०१४)



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