ईश्वरके गुण स्वयंमें आत्मसात हों, इस हेतु साधक साधना करते हैं । देवताके अन्य गुणोंपर साधकका ध्यान तो होता है, परन्तु देवताके तारक रूपमें उनका मुख हंसमुख और आनंदी होता है, यह कई व्यक्तियोंको ध्यान नहीं रहता । उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता है कि मन और शरीरका परस्पर एक दूसरेपर प्रभाव पडता है । मन गम्भीर हो, तो मुख गम्भीर दिखता है । इसके विरुद्ध, हंसमुख मुख रखनेपर मनके तनाव भी अल्प होते हैं । इसी प्रकार अन्योंको भी गम्भीर नहीं, हंसमुख मुखाकृति (चेहरा) देखना अच्छा लगता है; इसलिए प्रत्येकको यह ध्यान रखना चाहिए कि मुखपर मुस्कराहट हो, जिससे स्वयंके साथ अन्योंको भी आनन्द मिले । आरम्भमें मुखपर लाई हंसी कृत्रिम लगेगी, परन्तु कुछ ही सप्ताहमें वह प्राकृतिक लगने लगेगी । इसी सन्दर्भमें ‘हास्योपचार’ एक उपचार पद्धतिके रूपमें प्रचलित हो रही है । उसकी विशेषता हम बिना मूल्य ही उपयोगमें ला सकते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले (१६.३.२०१४)
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