गुरुकृपा बिना मन:शांति असम्भव !


किमत्रं बहुनोक्तेन शास्त्रकोटिशतैरपि । 

दुर्लभा चित्तविश्रान्तिः विना गुरुकृपां पराम् ।। – श्री गुरु गीता

र्थ : यहां बतानेकी क्या आवश्यकता है कि बिना अविरल गुरुकृपाके मन:शांति कोटि-कोटि शास्त्रोंके अध्ययन कर भी असंभव है !



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