श्रीगुरु उवाच


आधुनिक पीढी लैंगिक शिक्षणके कारण उद्ध्वस्त न हो; इसलिए हिन्दू राष्ट्रमें उस शिक्षणपर प्रतिबन्ध होगा !

सत्य, त्रेता और द्वापर युगमें लैंगिक विषयोंपर कोई चर्चा नहीं होती थी । उसकी आवश्यकता भी नहीं लगी; क्योंकि लैंगिकता एक नैसर्गिक विषय है । पशु-पक्षियोंको भी इसका शिक्षण कोई नहीं देता, कैसे निद्रा लें ?, यह जैसे सीखना नहीं पडता, उसी प्रकार लैंगिक शिक्षणकी भी आवश्यकता नहीं होती ।

वैसा शिक्षण न देनेके कारण ही पुरातनकालमें सभीका वर्तन सभ्य होता था । पुत्री युवा होती थी तो माता उसे सब समझाकर बताया करती थी । आज सर्वत्र दिए जानेवाले लैंगिक शिक्षणके कारण निर्लज्जता व्याप्त हो गई है । कक्षामें लडके और लडकियां एकत्रित होनेपर भी उस सम्बन्धमें प्रश्न पूछते हैं । इस कारण लडके-लडकियां आपसमें इस सन्दर्भमें बातें करते हैं और कौतुहलवश वैसी कृति करने लगते हैं । इसीसे उच्छृंखलता बढती है । व्यसनाधीन न हों, इसलिए मद्य, सिगरेट इत्यादि मादक (नशीले) पदार्थोंके दुष्परिणाम विषयी शिक्षण देनेके कारण जिस घातक विषयका ज्ञान युवाओंको नहीं होता, वह उन्हें ज्ञात हो जाता है, फलस्वरूप वे प्रयोग करनेके लिए मादक पदार्थ प्राप्तकर उसका सेवन करनेका प्रयास करते हैं । लैंगिक शिक्षण देनेपर भी ऐसा ही होता है । हिन्दू राष्ट्रमें ऐसे शिक्षणोंपर प्रतिबन्ध होगा । – परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले  (१.७.२०१४)



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