शिवनामामृत


 

शिवनामतरीं  प्राप्य  संसाराब्न्धि तरन्ति ते संसारमूलपापानि    तानि नश्यन्त्यसंशयम् ।।

 

संसारमूलभूतानां    पातकानां   महामुने   शिवनामकुठारेण   विनाशो   जायते  ध्रुवम ।।

शिवनामामृतं   पेयं    पापदावानलार्दितै   पापदावाग्नितप्तानां शान्तिस्तेन विना न हि ।।

शिवेति       नामपीयूषवर्षाधारापरिप्लुताः  संसारदवममध्येऽपि  न शोचन्ति   कदाचन ।।

शिवनाम्नि महभ्दक्तिजार्ता येषां महात्मनाम् तव्दिधानां तु सहसा   मुक्तिर्भवति सर्वथा ।।

( शि. पु. २३२९-३३)

अर्थ : जो शिवनामरूपी नौकापर आरुढ हो संसाररूपी समुद्रको पार करते हैं, उनके जन्म-मरणरूप संसारके मूलभूत वे सारे पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं । महामुने ! संसारके मूलभूत पातकरूपी पादपोंका शिवनामरूपी कुठारसे निश्चय ही नाश हो जाता है । जो पापरूपी दावानलसे पीडित है, उन्हें शिव नामरूपी अमृतका पान करना चाहिए । पापोंके दावानलसे दग्ध होनेवालोंको उस शिव-नामामृतके बिना शान्ति नहीं मिल सकती । जो शिव-नामरूपी सुधाकी वृष्टिजनित धारामें गोते लगा रहे हैं, वे संसाररूपी दावानलके मध्यमें खडे होनेपर भी कदापि शोकके भागी नहीं होते । जिन महात्माओंके मनमें शिवनामके प्रति बडी भारी भक्ति है, ऐसे व्यक्तियोंकी सहसा और सर्वथा मुक्ति होती है ।

 



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