धर्मका पक्ष


यस्मिंस्तु सर्वे स्युरसंनिविष्टा । धर्मो यतः स्यात् तदुपक्रमेत ।।

द्वेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके । कामात्मता खल्वपि न् प्रशस्ता ।।

वस्तुतः एक ओर जिसमें सब हो; परन्तु धर्म न हो और दूसरी ओर जिसमें केवल धर्म हो और कुछ न हो तो केवल धर्मका ही पक्ष ग्रहण कर उसीका अनुष्ठान करना चाहिए; क्योंकि अर्थपरायण प्राणी अकारण ही सबका द्वेषी बन जाता है और भोगपरायण कामीकी भी कोई प्रशंसा नहीं करता ।



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