
श्रीमद्भागवत पुराणमें कथा आती है कि रैवतक नामक राजाकी पुत्री रेवती बहुत लम्बी थी; अत: उसके अनुकूल वर नहीं मिलता था । इसके समाधान हेतु राजा योगबलसे अपनी पुत्रीको लेकर ब्रह्मलोक गए । वे जब वहां पहुंचे तब वहां गंधर्वगान चल रहा था; अत: वे कुछ क्षण रुके ।
जब गीत पूरा हुआ तो ब्रह्माने राजाको देखा और पूछा कि कैसे आना हुआ ? राजाने कहा, “मेरी पुत्रीके लिए किसी वरको आपने जन्म दिया है या नहीं ?”
ब्रह्माजी हंसे और कहा, “जितनी देर तुमने यहां संगीत सुना, उतने समयमें पृथ्वीपर २७ चर्तुयुगी {१ चर्तुयुगी = ४ युग ( सत्य, द्वापर, त्रेता, कलि ) = १ महायुग } बीत चुकी हैं और २८वां द्वापर समाप्त होनेवाला है ।
तुम वहां जाओ और कृष्णके भाई बलरामसे इसका विवाह कर देना । अब पृथ्वी लोकपर तुम्हें तुम्हारे सगे-सम्बन्धी, तुम्हारा राजपाट तथा वैसी भौगोलिक स्थितियां भी नही मिलेंगी जो तुम छोडकर आए थे । साथ ही, उन्होंने कहा कि यह अच्छा हुआ कि रेवतीको तुम अपने साथ लेकर आए, इस कारण इसकी आयु नहीं बढी, अन्यथा लौटनेके पश्चात तुम इसे भी जीवित नहीं पाते ।
अब यदि एक घडी भी देर की तो सीधे कलियुगमें (द्वापरके पश्चात कलयुग आता है) जा गिरोगे ।
इससे यह भी स्पष्ट है कि निश्चय ही ब्रह्मलोक हमारी आकाशगंगासे भी कहीं अधिक दूर है ।
यह कथा पृथ्वीसे ब्रह्मलोकतक विशिष्ट गतिसे जानेपर समयके अंतरको बताती है । आधुनिक वैज्ञानिकोंने भी कहा कि यदि एक व्यक्ति प्रकाशकी गतिसे कुछ कम गतिसे चलनेवाले अंतरिक्षयानमें बैठकर जाए तो उसके शरीरके अंदर परिवर्तनकी प्रक्रिया प्राय: स्तब्ध हो जाएगी ।
यदि एक दस वर्षका व्यक्ति ऐसे यानमें बैठकर देवयानी आकाशगंगाकी (Andromeida Galaz) ओर जाकर वापस आए तो उसकी आयुमें केवल ५६ वर्ष बढेंगे; किन्तु उस अवधिमें पृथ्वीपर 40 लाख वर्ष बीत चुके होंगे ।
कालके मापनेकी सूक्ष्मतम और महत्तम इकाईके वर्णनको पढकर विश्वके प्रसिद्ध ब्रह्माण्ड वैज्ञानिक कार्ल सगन (Carl Sagan) अपनी पुस्तक कोसमोसमें (Cosmos) लिखते हैं –
“विश्वमें एक मात्र हिन्दू धर्म ही ऐसा धर्म है, जो इस विश्वासको समर्पित है कि ब्रह्माण्डमें सृजन और विनाशका चक्र सतत चल रहा है । यही एक धर्म है जिसमें कालके सूक्ष्मतम माप परमाणुसे लेकर दीर्घतम माप ब्रह्म दिन और रातकी गणना की गई, जो ८ अरब ६४ करोड वर्षोंतक बैठती है तथा जो आश्चर्यजनक रूपसे हमारी आधुनिक गणनाओंसे मेल खाती है ।”
इससे ज्ञात होता है कि भारतीय वैदिक संस्कृतिकी काल गणना कितनी श्रेष्ठ है, तब भी हम मूर्खों जैसे वैदिक पंचांगकी नहीं अपितु ‘अंग्रेजी कैलेंडर’का अनुसरण करते हैं, अब तो विवाहसे लेकर जन्मतकका निर्धारण विदेशी समय अनुसार ही किया जाने लगा है, यह इस देशकी विडम्बना है !